ईचागढ़/चांडिल : सरायकेला-खरसावां जिले के ईचागढ़ प्रखंड अंतर्गत गौरांकोचा पंचायत के दालग्राम गाँव की 80–85 वर्षीय विंदू ग्वालीन की कहानी आज भी सरकारी सिस्टम की बेरुखी का सजीव उदाहरण बनकर खड़ी है। उम्र के इस पड़ाव में जहाँ बुजुर्गों को सहारे की ज़रूरत होती है, वहाँ विंदू ग्वालीन महीनों से नहीं, बल्कि **सालों से दफ्तर-दफ्तर चक्कर काट रही हैं**—सिर्फ अपने विस्थापित कार्ड से मिलने वाले हक का पैसा पाने के लिए, जिससे उनका इलाज हो सके।

















































लेकिन न नतीजा निकला, न सुनवाई हुई..
बीमार माँ को लेकर आदित्यपुर विकास भवन पहुँचे, फिर भी अधिकारी न आए बाहर… विंदू ग्वालीन के पुत्र भूवन गोप बताते हैं कि उनकी माँ गंभीर रूप से बीमार हैं और इलाज कराने के लिए पैसे तक नहीं हैं। उन्होंने कई बार चांडिल डैम विस्थापन से जुड़े कार्यालयों और आदित्यपुर विकास भवन का चक्कर लगाया, लेकिन…
“बीमार माँ बाहर बैठी रहीं, अधिकारी देखने तक नहीं आए”
- भूवन गोप ने अधिकारियों को लिखित पत्र दिया, जिसमें साफ लिखा
“अगर मेरी माँ पैसे के अभाव में दम तोड़ देती हैं, तो इसकी जिम्मेदारी चांडिल डैम विस्थापित कार्यालय के पदाधिकारियों की होगी।”
इतना गंभीर आरोप… पर फिर भी सिस्टम की तैयारी ज़ीरो
2019–20 में आवेदन, 2025 तक भी फाइल उसी जगह धरी…
भूवन गोप का कहना है—
“2019–20 में आवेदन दिया था। हर बार नया बहाना, नई तारीख…
लेकिन आज तक कोई काम नहीं हुआ। फाइल वहीं पड़े धूल खा रही है।”
यह मामला सिर्फ एक आवेदन की देरी नहीं, बल्कि सिस्टम की संवेदनहीनता का आईना है, जो विस्थापितों के दर्द को सुनने के लिए आज भी तैयार नहीं।
विस्थापित अधिकार मंच फाउंडेशन पहुँचा दालग्राम
घटना की सूचना पर विस्थापित अधिकार मंच फाउंडेशन के अध्यक्ष राकेश रंजन महतो दालग्राम पहुँचे। उन्होंने विंदू ग्वालीन से मिलकर उनकी हालत जानी और भरोसा दिलाया—
- “यथासंभव हर प्रयास करेंगे
- आपका हक दिलाने की लड़ाई जारी रहेगी।”
उन्होंने इस मामले में प्रशासन की व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहा
- “अगर 80 साल की बीमार बुजुर्ग को भी न्याय पाने के लिए इतने साल भागना पड़े,
- तो गरीबों के लिए शासन आखिर कहाँ खड़ा है?”
यह दर्द सिर्फ एक परिवार का नहीं — पूरे सिस्टम का है…
चांडिल डैम बनने के बाद से आज तक सैकड़ों विस्थापित परिवार अपने हक के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
चुनाव आते हैं, वादे चमकते हैं…
पर जब बात हक दिलाने की आती है, तो सिस्टम की फाइलें छह साल में भी नहीं चलतीं,
जबकि दर्द छह मिनट में बढ़ जाता है..
- सरकार की योजनाएँ दस्तावेज़ों पर चमकती हैं,
- लेकिन जब एक बूढ़ी माँ विकास भवन के बाहर तड़पती है,
- तो वह सिर्फ प्रशासन की विफलता नहीं—
- मानवता पर सवाल बन जाती है।
झारखंड स्थापना दिवस के 25 साल पूरे — पर क्या बदला गरीबों के जीवन में?
- राज्य गठन के 25 साल पूरे हो गए।
- जश्न, कार्यक्रम, बजट—सब कुछ हुआ।
लेकिन दालग्राम की यह 80 वर्षीय महिला जब अपने हक के लिए आज भी तरस रही है,
- तो यह सवाल उठना लाज़मी है—
- क्या झारखंड की असल उपलब्धि यही है
- कि 25 साल बाद भी गरीब, बुजुर्ग और विस्थापित
- सिस्टम के गेट पर खड़े रह जाते हैं—
और उनके लिए कोई अधिकारी बाहर तक नहीं आता?
विंदू ग्वालीन जैसे लोगों की पीड़ा बताती है कि
- राज्य भले 25 साल का हो गया हो,
- लेकिन न्याय, संवेदना और प्रशासनिक जिम्मेदारी
- अब भी कई जगहों पर शून्य पड़ी है।


