धनबाद : झारखंड के धनबाद समेत पूरे कोयलांचल क्षेत्र में इन दिनों कोयले का अवैध धंधा अपनी चरम सीमा पर है। प्रशासनिक सख्ती के दावों के बीच तस्करों के हौसले इतने बुलंद हैं कि दिन के उजाले से लेकर रात के अंधेरे तक कोयले की लूट जारी है। इस पूरे मामले में सबसे चौंकाने वाली बात सुरक्षा की जिम्मेदारी संभालने वाली CISF (केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल) की संदिग्ध भूमिका है, जो अब सीधे तौर पर जांच और चर्चा के घेरे में है।
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सुरक्षा घेरे को ठेंगा दिखाते तस्कर
कोयलांचल के विभिन्न क्षेत्रों—विशेषकर निरसा, बाघमारा और झरिया—से लगातार यह खबरें आ रही हैं कि सुरक्षा बलों की तैनाती के बावजूद अवैध उत्खनन और परिवहन धड़ल्ले से चल रहा है। स्थानीय ग्रामीणों और सूत्रों का कहना है कि कोयला चोरी का यह संगठित गिरोह बिना किसी डर के संचालित हो रहा है, जिससे सुरक्षा तंत्र की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लग गया है।
मुख्य सवाल जो जवाब मांग रहे हैं :
CISF की चुप्पी क्यों?: जिस बल पर खदानों की सुरक्षा का जिम्मा है, उनकी मौजूदगी में सैकड़ों टन कोयला गायब कैसे हो रहा है?
बड़ी मछलियों पर मेहरबानी?: छोटे-मोटे पेलो (मोटरसाइकिल) चलाने वालों पर तो कभी-कभी कार्रवाई होती है, लेकिन इस धंधे के असली ‘सिंडिकेट’ पर हाथ डालने से एजेंसियां क्यों कतरा रही हैं?
मिलीभगत की आशंका: क्या कोयले के इस काले खेल में सुरक्षा कर्मियों और रसूखदारों के बीच कोई ‘साठगांठ’ है?
राजस्व और पर्यावरण को भारी चोट
अवैध खनन न केवल भारत सरकार को करोड़ों के राजस्व का नुकसान पहुँचा रहा है, बल्कि सुरक्षित खनन के नियमों की अनदेखी के कारण पर्यावरण और मजदूरों की जान को भी जोखिम में डाल रहा है। अवैध मुहानों में अक्सर होने वाली दुर्घटनाएं इसका जीता जागता प्रमाण हैं।
निष्कर्ष
कोयलांचल में कोयले की यह लूट प्रशासन की कार्यक्षमता को चुनौती दे रही है। यदि समय रहते CISF और स्थानीय पुलिस ने अपनी जवाबदेही तय नहीं की, तो स्थिति और भी भयावह हो सकती है। जनता अब जवाब चाहती है कि आखिर किसके संरक्षण में कोयलांचल का यह ‘काला खेल’ फल-फूल रहा है।