लेखक सुभाष शाह की कलम से : एक टंकी ज्ञान-रूपी द्रव से भरा हुआ (गुरु) दूसरी टंकी खाली (मुर्ख या अज्ञानी) यदि दोनों को एक पाईप से जोड़ दिया जाता है, तो भरी हुई टंकी से खाली टंकी की ओर ज्ञान का संचार होता है। ठीक वैसे जैसे हाई वोल्टेज से निम्न वोल्टेज की ओर विद्युत का संचार होता है। इससे दो विपरित ध्रुव धनधुर्व और ऋणधुर्व उत्पन्न होते हैं। ठीक वैसा ही संबंध गुरु और शिष्य (मूर्ख, अज्ञानी) के बीच होता है।

मानव अस्तित्व और उसके विकास के लिए अत्यधिक श्रम की आवश्यकता और श्रम को व्याहारिक रूप देने हेतु श्रम की क्रियान्वयन के लिए साधन की आवश्यकता, वस्तुगत परिस्थिति (आवश्यक श्रम), साधन को व्यवहार में लाने के लिए बुद्धि गतिशील या जागृत होता है। वस्तुगत परिस्थिति श्रम की आवश्यक साधन और इससे उत्पन्न चेतना या बुद्धि बानर से नर बनने में सहायक सिद्ध हुई।
अतः वस्तुगत परिस्थिति और साधन (हथियार) से स्वतः ज्ञान प्राप्त होता है। साधन (उत्पादन) का लगातार विकास से लगातार ज्ञान-विज्ञान विकास संभव है। आज के दिन में महाशक्तियाँ (विश्व गुरू) अपने उत्पादन के साधन में लगातार विकास के कारण, ज्ञान-विज्ञान की महाशक्ति (विश्व गुरू) बनी हुई है। वर्तमान समय में चीन महाशक्ति (विश्वगुरु) के स्तर पर पहुँच सका है तो सिर्फ उसने अवश्य ही तुलनात्मक रूप से उत्पादन के साधनों का विकास किया है।
भारत महाशक्ति (विश्वगुरू) क्यों नही बन सकता….?
भारत सामंती संस्कृति (जो बर्बर युगिन संस्कृति का एक अंग है) को एक महान गौरवशाली संस्कृति के रूप में प्रतिष्ठित करने में लगा है। इसके लिये आवश्यक है, पिछड़ी हुई अर्थव्यवस्था को मजबूति से टिकाए रखना, लेकिन आधुनिक पूँजीवादी-ते धार के प्रहार के कारण यह संभव नहीं है। अल्पतम ही सही मगर पूँजीवादी व्यवस्था की दिशा में अग्रसर होना ही पड़ेगा। ऐसी परिस्थिति में भारतीय ज्ञान-विज्ञान धक्का मार की गति से आगे बढ़ेगी और विश्वगुरु का सपना, सपना ही रह जाएगा अगर भारत को विश्वगुरु बनना है, तो पिछड़ी अर्थव्यवस्थवाली समाज की संस्कृति का महिमामंडन न करके, उसके ऊपर चोट करना पड़ेगा।
चूँकि पुरानी संस्कृत विकास में बाधक होती है। वर्तमान में ऐसा करना बहुत कठिन काम हैं, इसके लिए बहुत जरूरी है, उत्पादन के साधनो में लगातार तीव्र गति से विकास और उसके साथ भारतीय जनता का सम्पर्क को बढ़ाना इस प्रकार भारतीय समाज का पिछड़ी संस्कृति से मुक्ति मिलेगा। जब तक जनता का मूलशक स्तर मे विकास नही होगा, तबतक विद्वानों की विद्वता किसी काम की नहीं होगी। निष्कर्ष भर भारतीय ज्ञान विज्ञान यानि शिक्षा पद भारी भरकम काम खर्च करना ही पड़ेगा भारतीय नेता (अभिनेता) बुद्धि के मामले में कहीं से कमजोर नहीं हैं. लेकिन उनकी सोच यह है कि वैसी बुद्धिमानी किस कम का जो उनके हित में न हो।
