जमशेदपुर : मानगो नगर निगम चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आ रहे हैं, वैसे-वैसे इस चुनावी रणभूमि में सियासी तापमान भी तेजी से बढ़ता जा रहा है। मौसम के साथ-साथ मानगो की राजनीति में भी समीकरण बदलते दिख रहे हैं। खासतौर पर कांग्रेस पार्टी के भीतर चल रही खींचतान अब खुलकर सामने आ गई है, जिसने पार्टी की रणनीति और एकजुटता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
मेयर पद की उम्मीदवार जेबा खान को लेकर कांग्रेस में मचा घमासान अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है। जहां एक ओर पार्टी के कई वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं ने सार्वजनिक रूप से जेबा खान को समर्थन देकर यह संकेत दिया कि वे उन्हें एक मजबूत और स्वीकार्य उम्मीदवार मानते हैं, वहीं दूसरी ओर जिला कांग्रेस कमेटी ने सख्त रुख अपनाते हुए जेबा खान को पार्टी से निष्कासित कर दिया है। जिला कांग्रेस कमेटी का आरोप है कि जेबा खान ने पार्टी लाइन के खिलाफ जाकर काम किया और अनुशासनहीनता की, जिसे किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। वहीं रविवार को मानगो के सुंदरबन में एक प्रेस वार्ता का आयोजन किया गया था। इस बैठक में कुछ वरिष्ठ कांग्रेसियों ने जेबा खान को समर्थन देने की बात कहा और सोनिया गांधी, राहुल गांधी, और कांग्रेस पार्टी जिंदाबाद के जमकर नारे लगाए…
इस पूरे घटनाक्रम ने कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति को उजागर कर दिया है। पार्टी के भीतर दो धड़े साफ तौर पर नजर आ रहे हैं—एक खेमा जो जेबा खान के साथ खड़ा दिखता है और दूसरा जो पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवार और निर्णयों के पक्ष में मजबूती से खड़ा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह टकराव केवल उम्मीदवार चयन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे स्थानीय नेतृत्व, गुटबाजी और भविष्य की राजनीति की गहरी लड़ाई छिपी हुई है।
इस सियासी उथल-पुथल के बीच एक अहम तथ्य यह भी है कि कांग्रेस के पूर्व स्वास्थ्य मंत्री बन्ना गुप्ता की पत्नी सुधा गुप्ता पहले से ही मानगो क्षेत्र से मेयर पद का चुनाव लड़ रही हैं। सुधा गुप्ता का नाम आते ही इस चुनाव को और भी राजनीतिक वजन मिल जाता है। एक तरफ जेबा खान को लेकर वरिष्ठ नेताओं का समर्थन और दूसरी तरफ सुधा गुप्ता का मजबूत राजनीतिक बैकग्राउंड—इन दोनों के बीच कांग्रेस का संतुलन बिगड़ता नजर आ रहा है।
जेबा खान के निष्कासन के बाद यह सवाल उठने लगे हैं कि क्या पार्टी ने समय रहते डैमेज कंट्रोल नहीं किया, या फिर यह फैसला जल्दबाजी में लिया गया। विपक्षी दलों को भी कांग्रेस की इस अंदरूनी कलह से बड़ा राजनीतिक हथियार मिल गया है, जिसे वे चुनावी प्रचार में भुनाने की कोशिश कर सकते हैं।
कुल मिलाकर मानगो नगर निगम चुनाव अब केवल स्थानीय मुद्दों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह कांग्रेस की संगठनात्मक मजबूती, नेतृत्व क्षमता और अनुशासन की परीक्षा बन चुका है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि कांग्रेस इस सियासी संकट से कैसे उबरती है और क्या वह एकजुट होकर चुनावी मैदान में उतर पाती है, या फिर यह अंदरूनी खींचतान मानगो की सत्ता की राह में उसके लिए सबसे बड़ी चुनौती साबित होती है।
