चांडिल/सरायकेला-खरसावां। विस्थापित अधिकार मंच फाउंडेशन के अध्यक्ष राकेश रंजन महतो ने छात्रों के हित में Generic Elective (GE) विषय को लेकर विस्तृत जानकारी साझा की है, ताकि हाल के दिनों में उत्पन्न भ्रम की स्थिति समाप्त हो सके। विशेष रूप से 2017–2023 सत्र के विद्यार्थियों के बीच GE-2, क्रेडिट, फॉर्म भरने तथा नौकरी और उच्च शिक्षा पर इसके प्रभाव को लेकर कई शंकाएँ सामने आई थीं।

उन्होंने बताया कि Generic Elective (GE) उच्च शिक्षा में बहु-विषयक (Multidisciplinary) अध्ययन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से शुरू किया गया प्रावधान है। यह प्रणाली University Grants Commission द्वारा लागू Choice Based Credit System (CBCS) के अंतर्गत लाई गई है। GE का उद्देश्य है कि छात्र केवल अपने मुख्य विषय तक सीमित न रहें, बल्कि अन्य विषयों का आधारभूत ज्ञान प्राप्त कर सकें और प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं व रोजगार के लिए बहुआयामी समझ विकसित कर सकें।
उदाहरण के तौर पर यदि कोई छात्र History (Core) विषय पढ़ रहा है, तो वह GE के अंतर्गत Political Science, Economics, Sociology या Environmental Studies जैसे विषय चुन सकता है। इसी प्रकार Science के छात्र भी विश्वविद्यालय के नियमों के अनुसार Arts या Commerce विषयों का चयन कर सकते हैं।
CBCS प्रणाली में स्नातक (UG) पाठ्यक्रम सामान्यतः Core Papers (मुख्य विषय), DSE (मुख्य विषय के वैकल्पिक पेपर), GE (अन्य विषय से चयनित पेपर) तथा AECC/SEC (कौशल/भाषा आधारित पेपर) से मिलकर बना होता है। GE पेपर प्रायः 4 या 6 क्रेडिट का होता है, जिसकी लिखित परीक्षा और आंतरिक मूल्यांकन दोनों होते हैं तथा इसके अंक मार्कशीट में अलग से दर्ज किए जाते हैं।
राकेश रंजन महतो ने बताया कि 2017–2023 सत्र के दौरान कुछ विश्वविद्यालयों में GE-2 या संबंधित GE पेपर की परीक्षा समय पर आयोजित नहीं हो सकी। इसके कारण कुछ छात्रों की मार्कशीट में GE अंक लंबित रह गए और कई छात्र बिना GE-2 परीक्षा दिए ही पास-आउट हो गए। बाद में प्रशासनिक स्तर पर इसे नियमित करने की प्रक्रिया शुरू की गई।
इसी संदर्भ में Kolhan University ने स्पष्ट किया है कि 2020–23 तक पास-आउट छात्रों की डिग्री वैध है और GE के कारण डिग्री की मान्यता प्रभावित नहीं होगी। साथ ही जिन छात्रों को आवश्यकता हो, उनके लिए सप्लिमेंटरी परीक्षा का विकल्प भी उपलब्ध कराया गया है।
डिग्री की वैधता पर स्थिति स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि यदि छात्र ने सभी सेमेस्टर पास कर लिए हैं और विश्वविद्यालय ने डिग्री जारी कर दी है, तो वह वैध मानी जाएगी। GE की अनुपस्थिति से स्वतः डिग्री रद्द नहीं होती। विश्वविद्यालय ने आधिकारिक रूप से मान्यता पर कोई प्रतिकूल प्रभाव न होने की बात कही है।
सरकारी नौकरी के संदर्भ में उन्होंने बताया कि यदि केवल सामान्य स्नातक योग्यता मांगी जाती है और GE का विशेष उल्लेख नहीं है, तो समस्या नहीं होगी। हालांकि यदि किसी पद पर विषय-विशेष अंक या कुल क्रेडिट की शर्त हो, तो GE-2 के अंक मांगे जा सकते हैं। शिक्षा विभाग या अकादमिक नियुक्तियों में कभी-कभी पूरा ट्रांसक्रिप्ट जांचा जाता है। ऐसे में यदि किसी विभाग द्वारा GE अंक की मांग की जाती है, तो परीक्षा देना भविष्य के विवाद से बचा सकता है।
बीएड, पीजी या अन्य प्रवेश परीक्षाओं के संदर्भ में उन्होंने कहा कि अधिकांश विश्वविद्यालय कुल प्रतिशत देखते हैं। यदि प्रवेश नियमों में न्यूनतम क्रेडिट की शर्त हो, तो GE का महत्व बढ़ सकता है। निजी संस्थान सामान्यतः डिग्री की वैधता पर ध्यान देते हैं, न कि अलग-अलग GE पेपर पर।
छात्रों के बीच उठ रहे सवालों पर उन्होंने स्पष्ट किया कि GE-2 परीक्षा देना तब तक अनिवार्य नहीं है, जब तक विश्वविद्यालय इसे विशेष रूप से अनिवार्य घोषित न करे। शिक्षा नीतियां समय-समय पर अपडेट होती रहती हैं, इसलिए आधिकारिक नोटिस पर नजर रखना आवश्यक है। यदि छात्र GE परीक्षा में अच्छा प्रदर्शन करते हैं, तो कुल प्रतिशत में सुधार संभव है। साथ ही GE विषय चयन विश्वविद्यालय और विभाग के अनुसार अलग-अलग हो सकता है।
अंत में विस्थापित अधिकार मंच फाउंडेशन ने विद्यार्थियों से अपील की है कि वे अपनी मार्कशीट और ट्रांसक्रिप्ट की जांच करें, जिस नौकरी या कोर्स के लिए आवेदन कर रहे हैं उसकी पात्रता शर्तें ध्यान से पढ़ें और केवल अफवाहों के आधार पर निर्णय न लें। किसी भी भ्रम की स्थिति में विश्वविद्यालय प्रशासन से लिखित स्पष्टता प्राप्त करना उचित होगा।
उन्होंने दोहराया कि GE बहु-विषयक शिक्षा का हिस्सा है, 2020–23 पास-आउट छात्रों की डिग्री वैध है, GE फॉर्म भरना सार्वभौमिक रूप से अनिवार्य घोषित नहीं है तथा भविष्य की नौकरी या उच्च शिक्षा को ध्यान में रखते हुए परीक्षा देना वैकल्पिक रूप से लाभकारी हो सकता है।
