लोकतंत्र सवेरा : सियासत की याददाश्त तेज होती है. जमशेदपुर की राजनीति में यह पूरा घटनाक्रम चर्चा का केंद्र बना हुआ है। कभी भाजपा के सबसे मुखर समर्थक रहे विकास सिंह आज उसी पार्टी के खिलाफ सबसे तीखे आलोचक बन बैठे हैं। जनता भी सब देख रही है—नारे भी, नाराजगी भी और नतीजे भी।
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सियासत में दोस्ती-दुश्मनी स्थायी नहीं होती, लेकिन जनता का फैसला स्थायी संदेश जरूर दे जाता है। पश्चिमी की जनता ने जो फैसला सुनाया, वह अब राजनीतिक गलियारों में एक उदाहरण बन चुका है।
अब देखना यह है कि विकास सिंह की यह नई पारी उन्हें कहां ले जाती है—जनता के दिल तक या फिर सियासत की उसी हाशिए पर, जहां से उन्होंने बगावत की शुरुआत की थी।
जमशेदपुर की सियासत में इन दिनों एक नाम फिर से सुर्खियों में है—विकास सिंह। कभी मंच से भारतीय जनता पार्टी के लिए गला फाड़-फाड़कर नारे लगाने वाले विकास सिंह आज उसी पार्टी पर खुलकर हमला बोल रहे हैं। वजह वही पुरानी—टिकट की सियासत।
भाजपा से टिकट नहीं मिला… तो फूंक दिया था बगावत का बिगुल…..
बताया जाता है कि जैसे ही भाजपा ने उन्हें चुनावी टिकट नहीं दिया, विकास सिंह ने बगावत का रास्ता चुन लिया। पार्टी लाइन छोड़कर निर्दलीय मैदान में उतर गए। प्रचार में तामझाम की कोई कमी नहीं—बैनर, पोस्टर, गाड़ियाँ, समर्थकों की फौज, सोशल मीडिया का शोर… सब कुछ पूरे दमखम के साथ। लेकिन जब नतीजे आए तो सियासी हकीकत ने आईना दिखा दिया। पश्चिमी क्षेत्र की जनता ने ऐसा नकारा कि जमानत तक नहीं बच पाई। कुल 2247 वोट—यानी जनता का “आशीर्वाद” इतना ही मिला। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा का विषय बन गया कि जो नेता खुद को जननेता बताते थे, उन्हें जनता ने ही सिरे से खारिज कर दिया।
अब अपने ही निशाने पर……
हार के बाद विकास सिंह का तेवर और तीखा हो गया है। जिन नेताओं के साथ कभी मंच साझा करते थे, आज उन्हीं पर शब्दबाण चला रहे हैं।
दिनेशानंद गोस्वामी को “दूध-भात” कह डाला।
जमशेदपुर के सांसद विद्युत वरण महतो पर “लाश पर राजनीति” करने का आरोप जड़ दिया।
राजा पीटर को “हिस्ट्रीशीटर अपराधी” कहने से भी नहीं चूके।
और अब विधायक सरयू राय से हिसाब मांग रहे हैं।
अब किसके साथ……?
दिलचस्प मोड़ यह है कि वही विकास सिंह अब मानगो नगर निगम चुनाव में मेयर प्रत्याशी कुमकुम श्रीवास्तव के समर्थन में उतर आए हैं। लोगों से अपील कर रहे हैं कि कुमकुम श्रीवास्तव को “भारी से भारी मतों से विजयी” बनाएं।
