पश्चिमी सिंहभूम : झारखंड का सारंडा वन, जिसे ‘700 पहाड़ियों की भूमि’ कहा जाता है, आज भी सुरक्षा बलों और नक्सलियों के बीच वर्चस्व की जंग का सबसे बड़ा केंद्र बना हुआ है। जहां एक ओर केंद्र और राज्य सरकारें देश से नक्सलवाद के पूर्ण खात्मे का दावा कर रही हैं, वहीं सारंडा की भौगोलिक स्थिति और नक्सलियों की गहरी पैठ ने इस मिशन के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है।



यहाँ इस “अधूरी जीत” की अंदरूनी कहानी और प्रशासन की वर्तमान रणनीति का विस्तृत विश्लेषण है:
1. सारंडा: नक्सलियों का ‘अभेद्य किला’ क्यों?
सारंडा केवल एक जंगल नहीं, बल्कि नक्सलियों के लिए एक रणनीतिक मुख्यालय की तरह है। इसके पीछे के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं:
- भौगोलिक बनावट : यह एशिया का सबसे घना साल (Sal) का जंगल है। इसकी सघनता इतनी अधिक है कि दिन में भी सूरज की रोशनी जमीन तक नहीं पहुँचती, जिससे ड्रोन और सैटेलाइट निगरानी सीमित हो जाती है।
- ट्राई-जंक्शन का लाभ : सारंडा की सीमाएं झारखंड, ओड़िशा और छत्तीसगढ़ से मिलती हैं। दबाव बढ़ने पर नक्सली आसानी से सीमा पार कर दूसरे राज्य में शरण ले लेते हैं।
- सुरक्षित शरणस्थली : जब ‘बूढ़ा पहाड़’ जैसे इलाकों से नक्सलियों का सफाया हुआ, तो बचे हुए शीर्ष कमांडरों ने सारंडा के बीहड़ों को अपना नया सुरक्षित ठिकाना बना लिया।
2. मिशन की विफलता के पीछे की ‘अंदरूनी कहानी’
प्रशासनिक दावों के बावजूद सारंडा में नक्सलियों की मौजूदगी के कुछ कड़वे सच ये हैं:
- शीर्ष नेतृत्व की मौजूदगी : माना जाता है कि माओवादियों की केंद्रीय समिति के सदस्य और कुख्यात कमांडर मिसिर बेसरा (जिस पर करोड़ों का इनाम है) इसी इलाके में कहीं छिपा है।
- स्थानीय नेटवर्क और सूचना तंत्र : नक्सली आज भी स्थानीय ग्रामीणों के बीच ‘डर’ और ‘विचारधारा’ के सहारे अपना सूचना तंत्र (Intelligence) मजबूत रखे हुए हैं। सुरक्षा बलों की हर हलचल की खबर उन तक पहुँच जाती है।
- आईईडी (IED) का जाल : नक्सलियों ने जंगलों के रास्तों में बड़ी संख्या में प्रेशर बम और आईईडी बिछा रखे हैं, जिससे सुरक्षा बलों के लिए ‘सर्च ऑपरेशन’ बेहद जोखिम भरा हो जाता है।
3. प्रशासन का ‘एक्शन मोड’: अब क्या है रणनीति?
पिछली गलतियों से सीखते हुए, प्रशासन अब ‘ऑपरेशन क्लीन’ के तहत नई रणनीति पर काम कर रहा है:
रणनीति विवरण
फॉरवर्ड बेस कैंप सुरक्षा बल अब केवल बाहर से हमला नहीं कर रहे, बल्कि जंगल के अंदरूनी हिस्सों में नए कैंप स्थापित कर रहे हैं। सड़क और कनेक्टिविटी नक्सलियों के विरोध के बावजूद, घने इलाकों में सड़कों का जाल बिछाया जा रहा है ताकि सुरक्षा बलों की आवाजाही तेज हो सके।
एक तरफ जहां केंद्र सरकार और सुरक्षा एजेंसियां दावा कर रही हैं कि देश से नक्सलवाद का लगभग सफाया हो चुका है, वहीं झारखंड का सारंडा वन इस मिशन की सफलता के आड़े आ रहा है। एशिया के सबसे घने जंगलों में शुमार सारंडा आज भी माओवादियों के लिए सबसे सुरक्षित शरणस्थली बना हुआ है। ‘बूढ़ा पहाड़’ जैसे इलाकों को मुक्त कराने के बाद अब सुरक्षा बलों का पूरा ध्यान इस दुर्गम क्षेत्र पर है।
अंदर की कहानी: क्यों फेल हो रहा है मिशन?
सूत्रों के अनुसार, माओवादियों के शीर्ष कमांडर, जिनमें करोड़ों के इनामी मिसिर बेसरा और अनल दा जैसे नाम शामिल हैं, इसी इलाके में अपनी पकड़ मजबूत किए हुए हैं। सारंडा की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि यहाँ ड्रोन से निगरानी करना भी मुश्किल हो जाता है। घने जंगलों और ऊबड़-खाबड़ रास्तों का फायदा उठाकर नक्सली एक राज्य से दूसरे राज्य (झारखंड से ओडिशा) की सीमा में आसानी से प्रवेश कर जाते हैं।
प्रशासन का ‘फुल एक्शन’ मोड
नक्सलियों के इस अंतिम गढ़ को ध्वस्त करने के लिए झारखंड पुलिस, सीआरपीएफ (CRPF) और कोबरा (CoBRA) बटालियन ने अब ‘फॉरवर्ड कैंप’ रणनीति अपनाई है।
- घेराबंदी: जंगल के उन हिस्सों में सुरक्षा बलों के कैंप स्थापित किए जा रहे हैं जहाँ आज तक कोई नहीं पहुँचा।
- सड़क निर्माण: प्रशासन का मानना है कि विकास ही नक्सलवाद का काट है, इसलिए विरोध के बावजूद अंदरूनी इलाकों में सड़कों का जाल बिछाया जा रहा है।
- खुफिया ऑपरेशन: स्थानीय सूचना तंत्र को मजबूत कर नक्सलियों की रसद और मूवमेंट को रोकने की योजना पर काम शुरू हो चुका है।
ग्रामीणों के बीच डर और उम्मीद
दशकों से लाल आतंक और पुलिस की कार्रवाई के बीच पिस रहे स्थानीय ग्रामीणों के लिए स्थिति अब भी चुनौतीपूर्ण है। हालांकि, प्रशासन के बढ़ते कदमों ने एक नई उम्मीद जगाई है कि जल्द ही सारंडा की पहाड़ियां नक्सलियों के कब्जे से मुक्त होंगी।
