“पुलिस की कहानी पर कोर्ट का बड़ा प्रहार, टीएम ज्वेलर्स के मालिक समेत कई आरोपियों को तलब“
जमशेदपुर : शहर के बहुचर्चित अजय बर्मन हत्याकांड में 19 वर्षों बाद ऐसा फैसला आया है, जिसने पूरे मामले को एक बार फिर सुर्खियों में ला दिया है। जिस घटना को पुलिस ने वर्षों पहले “मॉब लिंचिंग” बताकर लगभग बंद कर दिया था, उसे अदालत ने अब सुनियोजित हत्या करार दिया है। कोर्ट के इस फैसले ने न केवल पुलिस की जांच पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, बल्कि पीड़ित परिवार के लिए न्याय की नई उम्मीद भी जगा दी है।



प्रथम श्रेणी न्यायिक दंडाधिकारी अरविंद कुमार-तृतीय की अदालत ने मामले की सुनवाई के बाद टीएम ज्वेलर्स के मालिक मिलन अडेसरा, उनके भतीजे संदीप अडेसरा और अन्य आरोपियों के खिलाफ हत्या की धारा में संज्ञान लिया है। अदालत ने सभी आरोपियों को तलब करने का आदेश दिया है।
बकाया रकम मांगना पड़ा भारी, दुकान के भीतर हुई थी बेरहमी से पिटाई……
मामला 11 मई 2007 का है। 28 वर्षीय अजय बर्मन पेशे से सोनार थे और अपने घर पर ही आभूषण बनाने का काम करते थे। आरोप है कि वे अपने मेहनताना और बकाया पैसे मांगने गोलमुरी स्थित आकाशदीप प्लाजा के टीएम ज्वेलर्स पहुंचे थे।
परिजनों और जांच रिपोर्ट के अनुसार, ग्राहकों के जाने के बाद दुकान के भीतर अजय के साथ बेरहमी से मारपीट की गई। आरोप है कि मिलन अडेसरा, संदीप अडेसरा, दुकान के कर्मचारियों और कुछ भाड़े के लोगों ने मिलकर उनकी पिटाई की। यहां तक कि घटना के दौरान दुकान का सीसीटीवी कैमरा भी बंद कर दिया गया था। अजय के सिर पर स्टील के स्टूल से हमला किया गया और गंभीर रूप से घायल होने के बाद उन्हें घसीटकर दुकान के बाहर पार्किंग क्षेत्र में फेंक दिया गया।
हत्या को मॉब लिंचिंग का रूप देने का आरोप…….
मामले में सबसे चौंकाने वाला आरोप यह है कि हत्या के बाद पूरी घटना को मॉब लिंचिंग का रूप देने की कोशिश की गई। आरोपियों पर आरोप है कि उन्होंने पुलिस की मिलीभगत से एक ऐसी कहानी गढ़ी, जिससे हत्या की सच्चाई दब जाए. तत्कालीन सिदगोड़ा थाना प्रभारी पर आरोप है कि उन्होंने आरोपियों के पक्ष में मनगढ़ंत प्राथमिकी दर्ज की। एफआईआर में अजय बर्मन को “रिजवान” बताते हुए दावा किया गया कि वह बम और पिस्तौल लेकर रंगदारी मांगने दुकान पहुंचा था, जहां मौजूद लोगों ने उसे पकड़कर पीट-पीटकर मार डाला।
पीयूसीएल जांच में सामने आया था सच……
अजय बर्मन के परिजनों ने मामले की स्वतंत्र जांच की मांग की थी, जिसके बाद पीयूसीएल ने अपने स्तर पर जांच की। जांच में निष्कर्ष निकला कि अजय की मौत भीड़ की पिटाई से नहीं, बल्कि सुनियोजित हमले के कारण हुई थी। रिपोर्ट में स्पष्ट तौर पर हत्या की आशंका जताई गई थी।
19 साल बाद न्याय की उम्मीद…..
करीब दो दशक तक न्याय के लिए संघर्ष करने वाले अजय बर्मन के परिवार के लिए अदालत का यह आदेश बड़ी राहत माना जा रहा है। कोर्ट के फैसले ने एक बार फिर उस सवाल को जिंदा कर दिया है कि आखिर एक हत्या को मॉब लिंचिंग बताकर दबाने की कोशिश किसके संरक्षण में हुई थी. अब सभी की नजर आगामी सुनवाई पर टिकी है, जहां इस बहुचर्चित मामले की परतें और खुल सकती हैं।



