बिहार की राजनीति एक बार फिर नए मोड़ पर खड़ी है। सत्ता के खेल में चालें बदलना कोई नया नहीं, लेकिन इस बार जो चर्चा चल रही है उसने राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है।
बिहार के मुख्यमंत्री Nitish Kumar के बारे में लंबे समय से यह चर्चा है कि वे राज्यसभा जाने की तैयारी में हैं। वहीं दूसरी ओर उनके बेटे Nishant Kumar का नाम अचानक सत्ता के बड़े पद के लिए सामने आने लगा है। कहा जा रहा है कि राजनीति से अब तक दूरी बनाए रखने वाले निशांत कुमार को बिहार का उपमुख्यमंत्री बनाया जा सकता है।
यही वह सवाल है जिसने पूरे बिहार की राजनीति में बहस छेड़ दी है। आखिर क्या बिहार की सत्ता अब परिवारवाद की राह पर चल पड़ी है? क्या Janata Dal (United) में ऐसा कोई अनुभवी और जमीनी कार्यकर्ता नहीं है जो पार्टी और सरकार की जिम्मेदारी संभाल सके?
राजनीति या परिवारवाद?
वर्षों तक सिद्धांत और सुशासन की राजनीति की बात करने वाले नीतीश कुमार की छवि अलग रही है। लेकिन अगर बेटा सीधे सत्ता के शीर्ष पदों में एंट्री करता है तो सवाल उठना लाज़मी है।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि बिना संगठन में लंबा संघर्ष किए, बिना चुनाव लड़े और बिना जनाधार के सीधे सत्ता में बैठना लोकतंत्र की भावना पर सवाल खड़े करता है।
पार्टी कार्यकर्ताओं में भी बेचैनी…..
जेडीयू के कई पुराने कार्यकर्ता भी इस चर्चा को लेकर असहज नजर आ रहे हैं। उनका कहना है कि पार्टी में दशकों से मेहनत करने वाले हजारों नेता और कार्यकर्ता हैं, जिन्होंने गांव-गांव में संगठन खड़ा किया। अगर उन्हें दरकिनार कर परिवार को प्राथमिकता दी जाती है तो यह संदेश अच्छा नहीं जाएगा।
बिहार की राजनीति का नया अध्याय?…..
बिहार की राजनीति में परिवारवाद का आरोप पहले भी कई दलों पर लगता रहा है। लेकिन अगर जेडीयू में भी ऐसा होता है तो यह राज्य की राजनीति में एक नया अध्याय होगा।
अब सबसे बड़ा सवाल……
क्या यह सिर्फ राजनीतिक अफवाह है या फिर सत्ता के गलियारों में कोई बड़ी रणनीति तैयार हो रही है?
फिलहाल बिहार की जनता और राजनीतिक गलियारे दोनों ही इंतजार में हैं… क्योंकि बिहार की राजनीति में कब कौन सी चाल चल दी जाए, इसका अंदाजा लगाना आसान नहीं।
LOKTANTRA का सवाल………….
क्या लोकतंत्र में विरासत से सत्ता मिलनी चाहिए, या फिर संघर्ष और जनाधार से?
