रांची : झारखंड की औद्योगिक राजधानी कही जाने वाली धनबाद एक बार फिर सुर्खियों में है। वजह है कोयला तस्करी का वह नेटवर्क, जिसकी जड़ें सिर्फ खदानों तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि प्रशासनिक दफ्तरों और पुलिस थानों तक फैलती नजर आ रही हैं। ईडी की ताजा कार्रवाई ने इस पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े कर दिए हैं। साल 2015 से धनबाद में तैनात रहे डीसी और एसपी रैंक के अधिकारियों की संपत्ति जांच शुरू होना, इस बात का संकेत है कि मामला साधारण नहीं, बल्कि गहराई तक फैला हुआ है।

















































जब कोयला बना ‘काला सोना
धनबाद और आसपास के इलाकों में कोयला सिर्फ ईंधन नहीं, बल्कि कमाई का बड़ा जरिया रहा है। बीसीसीएल की खदानें, रेलवे रूट, हाईवे और ग्रामीण रास्ते – सब कुछ कोयला ढुलाई और तस्करी के नेटवर्क से जुड़ा रहा है। ईडी के अनुसार, इसी नेटवर्क ने एक संगठित सिंडिकेट का रूप ले लिया, जहां कारोबारियों, बिचौलियों और कथित तौर पर कुछ सरकारी तंत्र के बीच तालमेल बना।
ईडी की नजर अफसरों पर टिकी
ईडी सूत्रों का कहना है कि कोयला तस्करी इतने बड़े पैमाने पर बिना किसी संरक्षण के संभव नहीं थी। इसी संदेह के आधार पर एजेंसी ने 2015 के बाद धनबाद में तैनात रहे सभी डीसी, एसएसपी, सिटी एसपी, ग्रामीण एसपी और डीएसपी रैंक के अधिकारियों को जांच के दायरे में लिया है। कार्मिक विभाग से डीसी रैंक के अफसरों की आय और अचल संपत्ति का ब्योरा मांगा गया है, जबकि पुलिस मुख्यालय से वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के पैन डिटेल और संपत्ति से जुड़ी जानकारी तलब की गई है।
थानों तक पहुंची जांच की आंच
जांच सिर्फ बड़े अफसरों तक सीमित नहीं है। ईडी ने उन थाना प्रभारियों की सूची भी मांगी है, जो कोयला खनन क्षेत्रों और कोयला तस्करी से जुड़े रूट के थानों में तैनात रहे। माना जा रहा है कि स्थानीय स्तर पर तस्करी को सुचारु रूप से चलाने में थानों की भूमिका अहम रही होगी। इसी कड़ी को जोड़ने की कोशिश अब जांच एजेंसी कर रही है।
छापेमारी और डिजिटल सबूतों से रोज हो रहे खुलासे
21 नवंबर और 12 दिसंबर को ईडी की छापेमारी ने इस पूरे मामले को नया मोड़ दिया। कोयला कारोबारियों के ठिकानों से मिले डिजिटल साक्ष्य, खासकर पुलिस और सरकारी अधिकारियों के साथ हुई चैट, जांच का आधार बन रहे हैं। इन चैट्स में रोजाना हो रही कोयला तस्करी, लेन-देन और संरक्षण से जुड़े संकेत मिलने की बात कही जा रही है।
अनिल गोयल और सिंडिकेट कनेक्शन
जांच के केंद्र में कोयला कारोबारी अनिल गोयल का नाम प्रमुखता से सामने आया है। ईडी के मुताबिक, अनिल गोयल का सिंडिकेट न सिर्फ मजबूत था, बल्कि इसके तार कई प्रभावशाली लोगों से जुड़े हुए थे। बीसीसीएल के आउटसोर्सिंग संचालक लालबाबू सिंह, उनके भाई कुंभनाथ सिंह और अन्य कारोबारी भी इस नेटवर्क का हिस्सा बताए जा रहे हैं। इन्हीं मामलों को जोड़कर ईडी ने चार ईसीआईआर दर्ज की है।
प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल
इस पूरे प्रकरण ने प्रशासनिक व्यवस्था की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अगर जांच में आरोप सही साबित होते हैं, तो यह दिखाता है कि किस तरह वर्षों तक एक पूरा तंत्र तस्करी को नजरअंदाज करता रहा या उसका हिस्सा बना रहा। साल 2015 से अब तक तैनात रहे सभी अफसरों को जांच के दायरे में लेना, इसी सिस्टमेटिक चूक या संभावित मिलीभगत की ओर इशारा करता है।
शुरूआती दौर में जांच
ईडी अधिकारियों का कहना है कि जांच अभी शुरुआती दौर में है। डिजिटल साक्ष्यों की फॉरेंसिक जांच और संपत्ति के मिलान के बाद बड़े खुलासे हो सकते हैं।





