लेखक सुभाष शाह : जब मानव सभ्यता का कोई ढाँचा नहीं था, तब अराजकता ही जीवन का मूल स्वरूप थी। वही अराजकता आगे चलकर आतंकवाद के रूप में प्रकट हुई, जो प्रारंभिक मानव संस्कृति का स्वाभाविक हिस्सा था। जैसे-जैसे समाज ने व्यवस्था, नियम, और शासन को जन्म दिया, आतंकवाद में भी क्रमशः कमी आती गई।



मानव विकास की लंबी यात्रा —
क़बीलाई समाज → दास-व्यवस्था → सामंतवादी ढाँचा → पूंजीवादी व्यवस्था → औपनिवेशिक समाज —
इन सभी चरणों में देखा गया कि जहाँ समाज व्यवस्थित हुआ, वहाँ आतंकवाद का ह्रास स्वतः हुआ। इसलिए यह स्पष्ट है कि अव्यवस्था ही आतंकवाद की जड़ है।
समाज में जब-जब अराजकता बढ़ती है, आतंक अपनी नई-नई शक्लों में उभरता है। संसार में कोई भी शक्ति केवल बल प्रयोग से आतंकवाद को समाप्त नहीं कर सकती। बल आधारित समाधान केवल “प्रति-आतंकवाद” पैदा करता है, न कि वास्तविक शांति। आतंकवाद का अंत तभी संभव है, जब समाज सुव्यवस्थित हो और संस्थाएं मजबूत हों।
प्रकृति के नियमों के अनुसार, प्रारंभ से मानव जीवन विभिन्न प्रकार के भय और संकटों से घिरा रहा है। यही ‘प्राकृतिक आतंक’ समय-समय पर नए स्वरूप में सामने आता है और आगे भी आता रहेगा—इसलिए इसे सनातन कहा गया है।
बौद्ध दर्शन भी यही कहता है…..
जहाँ मानव है, वहाँ समस्याएं हैं; और जहाँ समस्याएं हैं, वहाँ समाधान का मार्ग भी विज्ञान, ज्ञान और व्यवस्था के रूप में मौजूद है। इसलिए आतंकवाद का वास्तविक उपचार शक्ति नहीं, बल्कि सुव्यवस्था, सामाजिक न्याय और ज्ञान आधारित नीति है।
