नीमडीह में फिर भड़का जमीन आंदोलन, एसएम स्टील के खिलाफ ग्रामसभा सड़कों पर — बिना सहमति चल रहे काम को बंद कराने की मांग



नीमडीह। दीनबंधु पांडा। मंगलवार की सुबह नीमडीह की हवा में असंतोष साफ महसूस किया जा सकता था। अदरडीह दुर्गा मंदिर से निकली पैदल रैली जब प्रखंड सह अंचल कार्यालय की ओर बढ़ी, तो यह महज़ एक जुलूस नहीं था, बल्कि जल-जंगल-जमीन की रक्षा की सामूहिक पुकार थी। संयुक्त ग्रामसभा मंच, नीमडीह के बैनर तले सैकड़ों ग्रामीण—महिला-पुरुष—एसएम स्टील एंड पावर लिमिटेड की प्रस्तावित स्थापना के विरोध में फिर एकजुट हुए।

ग्रामीणों का आरोप है कि नीमडीह के छह मौजा में बिना ग्रामसभा की सहमति, बिना वैध NOC और बिना जमीन बिके ही कंपनी के लिए काम शुरू करा दिया गया है। जिन जमीनों पर गतिविधि चल रही है, उन्हें ग्रामीणों ने कभी बेचा ही नहीं। इसे लेकर ग्रामीणों ने अंचल कार्यालय में अंचलाधिकारी से सीधे सवाल किए और त्वरित रूप से काम बंद कराने का लिखित आवेदन सौंपा।
आवेदन में C.N.T. Act-1908 की धारा 49 तथा अनुसूचित क्षेत्र में भूमि अधिग्रहण से पूर्व ग्रामसभा से परामर्श व सहमति के प्रावधानों के उल्लंघन का स्पष्ट उल्लेख किया गया है।

ग्रामीणों ने दो टूक कहा कि इससे पहले 11 नवंबर 2025 को हुई जनसुनवाई में भी उन्होंने विरोध दर्ज कराया था, लेकिन आज तक उनकी आपत्तियों को अनसुना किया गया। आरोप है कि बिचौलियों के जरिए जमीन की खरीद-फरोख्त दिखाई गई, जबकि 95 प्रतिशत से अधिक जमीनदाता कंपनी को जमीन देने के पक्ष में नहीं हैं। कई ग्रामीणों को प्रति डिसमिल 44 हजार के बजाय मात्र 11 हजार रुपये दिए गए, कई को कुछ भी नहीं मिला।

विस्थापित अधिकार मंच फाउंडेशन के अध्यक्ष राकेश रंजन ने इसे PESA कानून की खुली अवहेलना बताया। उन्होंने कहा कि ग्रामसभा की सहमति के बिना न जमीन वैध है, न कंपनी का दावा। PESA की धारा 4(d) स्पष्ट करती है कि जल-जंगल-जमीन पर ग्रामसभा का नियंत्रण है और वही तय करेगी कि जमीन दी जाए या नहीं।
मौके पर अंचलाधिकारी ने पीड़ित ग्रामीणों से वार्ता कर भरोसा दिलाया कि उनके साथ अन्याय नहीं होगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि संबंधित जमीन का NOC अब तक निर्गत नहीं हुआ है। आवेदन लेने के बाद अंचल कार्यालय की ओर से रिसिविंग भी दी गई।

ग्रामीणों ने चेतावनी दी कि यदि बिना ग्रामसभा की लिखित सहमति और गारंटी के कार्य जारी रहा, तो आंदोलन और तेज किया जाएगा। नीमडीह में आज यह साफ हो गया कि यह लड़ाई सिर्फ एक कंपनी के खिलाफ नहीं, बल्कि सरकार की नीतियों और आदिवासी अधिकारों की अनदेखी के खिलाफ है।
