जमशेदपुर। नगर निकाय चुनाव औपचारिक रूप से गैर-दलीय आधार पर कराए जा रहे हैं। चुनाव आयोग की अधिसूचना के अनुसार प्रत्याशी किसी राजनीतिक दल के अधिकृत चुनाव चिन्ह पर मैदान में नहीं हैं। इसके बावजूद विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा समर्थित उम्मीदवारों को लेकर आंतरिक अनुशासन और निष्कासन की कार्रवाई ने स्थानीय सियासत को गरमा दिया है।
चुनाव भले ही “गैर-दलीय” घोषित हो, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि लगभग हर वार्ड में किसी न किसी दल का अप्रत्यक्ष समर्थन देखने को मिल रहा है। ऐसे में जब कुछ नेताओं या कार्यकर्ताओं को पार्टी लाइन से अलग रुख अपनाने पर निष्कासित किया जा रहा है, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि गैर-दलीय चुनाव में दलगत अनुशासन का दायरा कितना उचित है।
समर्थन खुला, जिम्मेदारी सीमित
कई राजनीतिक दल आधिकारिक तौर पर यह कह रहे हैं कि चुनाव पार्टी के चिन्ह पर नहीं लड़ा जा रहा है, इसलिए यह स्थानीय स्तर का चुनाव है। वहीं दूसरी ओर, मंच साझा करना, संयुक्त प्रेस वार्ताएं, और समर्थित प्रत्याशियों के पक्ष में प्रचार अभियान इस बात का संकेत दे रहे हैं कि राजनीतिक प्रभाव पूरी तरह अनुपस्थित नहीं है।
विश्लेषकों का मानना है कि दल अपनी राजनीतिक पकड़ बनाए रखने के लिए “समर्थन” की रणनीति अपना रहे हैं, लेकिन जब कोई कार्यकर्ता या पदाधिकारी अलग प्रत्याशी के साथ दिखाई देता है, तो अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू हो जाती है।
निष्कासन की कार्रवाई पर उठे सवाल
हाल के दिनों में कुछ दलों द्वारा अपने पदाधिकारियों और सक्रिय कार्यकर्ताओं को पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में निष्कासित किए जाने की खबरें सामने आई हैं। संबंधित नेताओं का तर्क है कि जब चुनाव दलीय आधार पर नहीं है और अधिकृत चिन्ह का उपयोग नहीं हो रहा, तो समर्थन के आधार पर निष्कासन की कार्रवाई विरोधाभासी प्रतीत होती है।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों के अनुसार, यह स्थिति स्थानीय स्तर पर आंतरिक शक्ति संतुलन और भविष्य की राजनीतिक संभावनाओं से भी जुड़ी हो सकती है। नगर निकाय चुनाव को कई दल आगामी विधानसभा और लोकसभा चुनावों की तैयारी के रूप में भी देख रहे हैं।
कार्यकर्ताओं में असमंजस
पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच भी असमंजस की स्थिति है। एक ओर उन्हें आधिकारिक रूप से “गैर-दलीय” चुनाव का हवाला दिया जाता है, दूसरी ओर संगठनात्मक अनुशासन का पालन करने की अपेक्षा की जाती है। इससे जमीनी स्तर पर भ्रम की स्थिति बन रही है।
लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर प्रभाव
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि गैर-दलीय चुनाव की अवधारणा स्थानीय मुद्दों को प्राथमिकता देने के लिए बनाई गई है, ताकि विकास और जनहित के प्रश्न केंद्र में रहें। किंतु यदि दलगत समीकरण और निष्कासन की कार्रवाई हावी रहती है, तो मूल उद्देश्य प्रभावित हो सकता है।
अब देखना होगा कि चुनावी प्रक्रिया आगे किस दिशा में बढ़ती है। क्या राजनीतिक दल स्पष्ट रुख अपनाएंगे, या गैर-दलीय चुनाव के नाम पर परोक्ष राजनीतिक दखल जारी रहेगा?
फिलहाल नगर निकाय चुनाव में प्रचार के साथ-साथ संगठनात्मक अनुशासन और निष्कासन की कार्रवाई भी चर्चा का विषय बनी हुई है, जिसने स्थानीय राजनीति को नई बहस दे दी है।
