लोकतंत्र सवेरा/जमशेदपुर : शहर का गौरव, अंतरराष्ट्रीय क्रिकेटर सौरव तिवारी—जिन्होंने अपने बल्ले की गूंज से न सिर्फ झारखंड बल्कि पूरे देश का नाम रोशन किया—आज फिर सुर्खियों में हैं। लेकिन इस बार वजह कोई शानदार सिक्स, धुआंधार पारी या नया रिकॉर्ड नहीं… बल्कि उनकी वही कर्मभूमि, ‘केबल मैदान’, जिसकी मिट्टी में उन्होंने पहला कदम रखा था, उसी की बदहाली है आज चर्चा में।

















































जहां से शुरू हुआ था सफर, आज वहीं पसरी है बदहाली और गंदगी का अंबार…..
यही केबल मैदान कभी खिलाड़ियों की ऊर्जा से गुलजार रहता था। सुबह से शाम तक बल्ला-गेंद की आवाजें एक अलग ही माहौल रचती थीं। यही मैदान सौरव तिवारी की क्रिकेटीय यात्रा का पहला पड़ाव था— पर आज वही मैदान बदहाली, दुर्गंध, गंदगी और लापरवाही का शिकार है।
कभी खिलाड़ियों के पसीने से महकने वाला यह मैदान अब कूड़े, सड़ांध और नशेड़ियों की गतिविधियों से बदनाम हो रहा है। रात होते ही यह मैदान नशेड़ियों और शराबियों का अड्डा बन जाता है—यह किसी एक दिन की बात नहीं, बल्कि रोजमर्रा की कहानी है।
मूलभूत सुविधाओं का टोटा – खिलाड़ी मजबूर
इस मैदान में न तो
✔ सही पिच
✔ न सही आउटफील्ड
✔ न बैठने की व्यवस्था
✔ न साफ–सफाई
✔ न शौचालय
✔ न सुरक्षा
खिलाड़ी मजबूर हैं, माता-पिता अपने बच्चों को यहां भेजने से डरते हैं, और स्थानीय लोग बदबू की वजह से गुजरना भी पसंद नहीं करते।
सवाल ये नहीं कि सौरव तिवारी कौन हैं… सवाल ये है कि मैदान कौन सा है!…..
सौरव तिवारी ने इस शहर, इस मैदान को बहुत कुछ दिया। लेकिन क्या उनका इस मैदान पर भी कोई कर्ज नहीं?
क्योंकि वह अब….
– अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट खेल चुके हैं,
– आईपीएल का लंबा अनुभव रखते हैं,
– और आज जेएससीए में एक मजबूत पद पर आसीन हैं।
क्या अपनी कर्मभूमि की तरफ एक बार देखने के लिए भी इतना समय नहीं?
एक हस्तक्षेप, एक बात, एक पहल—कई बार इतना काफी होता है कि कोई मैदान फिर से सांस ले सके।
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केबल मैदान की कराह सुनाई दे रही है… लेकिन क्या सुनने वाला कोई है?…..
यह सिर्फ एक खेल मैदान की बात नहीं,
यह एक इतिहास, एक परंपरा, एक भावना, और युवा खिलाड़ियों के भविष्य की बात है।
केबल मैदान आज पूछ रहा है……
“जब मेरा बबुआ चमक गया… तो मैं क्यों अंधेरों और दुर्गंध में सड़ता रहूं?”
स्थानीय प्रतिनिधि भी मौन
न खेल विभाग की चिंता,
न किसी जनप्रतिनिधि की नज़र…
सब कुछ भगवान भरोसे छोड़ दिया गया है।
मैदान की हालत ऐसी कि ऐसा लगता है जैसे शहर के बीचोंबीच एक भूला हुआ, बेजान मैदान दम तोड़ रहा हो।
नतीजा – खेल मर रहा है, खिलाड़ी टूट रहे हैं।
जहां कभी बच्चे क्रिकेट सीखने आने के लिए व्याकुल रहते थे।
आज वहां बच्चे आने से डरते हैं।
गंदगी और असुरक्षा ने मैदान की मूल पहचान निगल ली है।
अब भी वक्त है… मैदान को बचाइए
सौरव तिवारी हों या जेएससीए, स्थानीय प्रशासन हो या समाज— सबकी संयुक्त जिम्मेदारी है कि केबल मैदान को उसकी पुरानी चमक लौटाई जाए।
क्योंकि….
खिलाड़ी भले आगे निकल जाए, लेकिन मैदान की मिट्टी कभी बूढ़ी नहीं होती। और आज वही मिट्टी मदद के लिए पुकार रही है।





