देवघर : बाबा बैद्यनाथ की नगरी देवघर, जहां हर दिन आस्था उमड़ती है, वहीं अव्यवस्था भी सिर चढ़कर बोल रही है. शहर में रोजाना हजारों श्रद्धालु पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं, लेकिन पार्किंग व्यवस्था की दुर्दशा ने श्रद्धा को तनाव में बदल दिया है. शहर इन दिनों गाड़ियों के जाम, विवाद और क्षतिग्रस्त वाहनों की नई कहानी लिख रहा है. धार्मिक नगरी की पवित्रता अब पार्किंग की कुव्यवस्था के कारण कलंकित होती दिख रही है. देवघर में प्रतिदिन हजारों वाहनों का आवागमन होता है, लेकिन शहर में न पार्किंग का ठिकाना है, न जिम्मेदारी तय है. स्थानीय लोगों के घरों के बाहर श्रद्धालुओं की गाड़ियां लगने से विवाद हो जाता है और कई बार आक्रोश भारी पड़ जाता है.

श्रद्धालुओं ने व्यवस्था पर उठाए सवाल
ऐसा ही एक ताजा मामला मुंगेर के श्रद्धालु फंटूश सिंह के साथ हुआ. फंटूश परिवार के साथ बाबा बैद्यनाथ का दर्शन करने आए थे, लेकिन लौटे टूटी हुई गाड़ी के साथ. फंटूश सिंह ने आपबीती बताई. उन्होंने कहा कि वे गाड़ी लगाकर खाना खाने गए थे, तभी जिनके घर के आगे गाड़ी थी उन्होंने बिना कुछ बोले गाड़ी पर लाठियां बरसा दीं. हजारों का नुकसान हो गया. फंटूश सिंह ने प्रशासन से सवाल उठाते हुए कहा कि जब नगर निगम गाड़ियों की रसीद काटता है, तो फिर सुरक्षा और पार्किंग की जिम्मेदारी कौन लेगा? देवघर नगर निगम हर वाहन से शुल्क तो वसूलता है, लेकिन पार्किंग की सुविधा नहीं देता है.
इस मुद्दे पर स्थानीय जनप्रतिनिधि और मेयर प्रत्याशी सूरज झा ने भी तल्ख लहजे में कहा देवघर की पार्किंग समस्या अब शहर की सबसे बड़ी बीमारी बन गई है. हमने पहले भी जलसार मोड़ के पास तालाबों के किनारे पार्किंग स्थल बनाने का सुझाव दिया था. डीसी ने इसपर आश्वासन भी दिया था, पर नतीजा सिफर रहा. अगर मुझे शहर की कमान मिली, तो यह मेरा पहला संकल्प होगा.
वैकल्पिक स्थल तलाशे जाएंगेः नगर आयुक्त
इधर, जब इस पूरे मसले पर नगर आयुक्त से पूछा गया, तो उन्होंने सफाई दी कि नेहरू पार्क और शिवलोक जैसे स्थानों पर पार्किंग की सुविधा दी गई है, लेकिन श्रद्धालुओं की भारी भीड़ के सामने वे भी अपर्याप्त पड़ रहे हैं. उन्होंने आगे कहा कि प्रशासन अब वैकल्पिक स्थलों की तलाश में है, ताकि श्रद्धालु और स्थानीय लोग आमने-सामने न हों.
देवघर की छवि हो रही धूमिल
लेकिन सवाल यह है कि इतने सालों से देवघर को ‘धार्मिक पर्यटन केंद्र’ के रूप में विकसित करने की बातें होती रहीं, तो क्या पार्किंग व्यवस्था इस विकास की परिभाषा से बाहर है? यह वही देवघर है जहां हर दिन हजारों श्रद्धालु बाबा बैद्यनाथ के दर्शन के लिए आते हैं. कुछ अपना व्रत पूर्ण करने, कुछ अपनी मनोकामना लेकर, लेकिन यही श्रद्धालु जब लाठी और अपमान का शिकार बनते हैं, तो शहर की छवि धूमिल होती है.
देवघर की पहचान आस्था से है, पर अब प्रशासनिक उदासीनता ने इस पावन शहर को कुव्यवस्था की गिरफ्त में ले लिया है. गाड़ियां टूट रही हैं, श्रद्धा टूट रही हैं और प्रशासन सिर्फ ‘व्यवस्था सुधारने के प्रयास’ का राग अलाप रहा है.
साख पर सवाल
दरअसल, यह केवल पार्किंग की समस्या नहीं यह देवघर की साख का सवाल है. जिस शहर की अर्थव्यवस्था श्रद्धालुओं की आमद से चलती है, वही शहर अगर उन्हीं श्रद्धालुओं के लिए असुरक्षित बन जाए, तो इसे आस्था की नगरी कहना विडंबना नहीं, त्रासदी है. आवश्यक है कि जिला प्रशासन तुरंत इस समस्या पर ठोस कदम उठाए. स्पष्ट पार्किंग जोन चिह्नित करें और स्थायी समाधान निकाले, ताकि न श्रद्धा आहत हो और न शहर की साख. क्योंकि सवाल सिर्फ गाड़ियों की क्षति का नहीं देवघर की गरिमा का है.
