चांडिल (सरायकेला-खरसावां): चांडिल प्रखंड अंतर्गत चिलगु पंचायत के ग्राम सालगाडी में मरांगबुरू मार्शल गावता सालगाडीह के तत्वाधान में एक दिवसीय खेलकूद एवं संथाली ओल चिकी प्रतियोगिता का भव्य आयोजन किया गया। कार्यक्रम का आयोजन रतन मार्डी के नेतृत्व में हुआ, जिसमें बच्चों, युवाओं और महिलाओं ने बढ़-चढ़कर भाग लिया।
आयोजन का मुख्य उद्देश्य संथाली भाषा की ओल चिकी लिपि के संरक्षण, संवर्धन और व्यापक प्रचार-प्रसार को सुनिश्चित करना था, ताकि नई पीढ़ी अपनी मातृभाषा और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ी रह सके। कार्यक्रम के दौरान 100 मीटर दौड़, हांडी फोड़, बेलून फोड़, मोमबत्ती रेस, सुई-धागा रेस सहित कई रोचक प्रतियोगिताएं आयोजित की गईं। पूरे दिन गांव में उत्साह और उमंग का माहौल बना रहा।
“ओल चिकी टैलेंट प्रतियोगिता” रही आकर्षण का केंद्र
कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण “ओल चिकी टैलेंट प्रतियोगिता” रही, जिसमें प्रतिभागियों ने ओल चिकी लिपि में लेखन-पाठन एवं सांस्कृतिक प्रस्तुति के माध्यम से अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया।
प्रतियोगिता में:
- प्रथम स्थान – अनिता हांसदा (ड्रेसिंग टेबल से सम्मानित)
- द्वितीय स्थान – धीरेन सोरेन (ड्रेसिंग टेबल प्रदान)
- तृतीय स्थान – लक्ष्मी टुडू (कुर्सी प्रदान)
- चौथे से दसवें स्थान तक – स्कूल बैग देकर सम्मानित
ओल चिकी केवल लिपि नहीं, अस्मिता का प्रतीक: डॉ. मुर्मू
इस अवसर पर डॉ. सत्य नारायण मुर्मू ने कहा कि पंडित रघुनाथ मुर्मू केवल लिपि निर्माता नहीं थे, बल्कि संथाली समाज के महान शिक्षाविद, समाज सुधारक और सांस्कृतिक चेतना के अग्रदूत थे। उन्होंने वर्ष 1925 में ओल चिकी लिपि का निर्माण उस समय किया, जब संथाली भाषा की अपनी स्वतंत्र लिखित लिपि नहीं थी। उनका उद्देश्य था कि संथाली समाज शिक्षा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बने और अपनी भाषा में ज्ञान अर्जित करे।
डॉ. मुर्मू ने कहा कि ओल चिकी केवल एक लिपि नहीं, बल्कि संथाली अस्मिता और अस्तित्व का प्रतीक है। आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में इसके व्यापक प्रचार-प्रसार की आवश्यकता है। वे झारखंड के विभिन्न क्षेत्रों में जागरूकता कार्यक्रम, प्रतिभा प्रतियोगिता और सांस्कृतिक आयोजन के माध्यम से भाषा के प्रति गर्व और अपनापन विकसित करने का कार्य कर रहे हैं।
उन्होंने कहा कि पंडित रघुनाथ मुर्मू का सपना था कि ओल चिकी लिपि घर-घर तक पहुंचे और हर संथाली परिवार शिक्षित बने। ऐसे आयोजन उसी सपने को साकार करने की दिशा में ठोस प्रयास हैं। कार्यक्रम को सफल बनाने में नरेंद्र मांझी, सत्य रंजन सोरेन, रंजीत टुडू, मनोज मार्डी, सुसेन मार्डी, अमित कुमार मार्डी, सुधीर चंद्र मुर्मू, दारायबुरू हांसदा सहित कई समाजसेवियों का सराहनीय योगदान रहा।
स्थानीय लोगों ने इस आयोजन को संथाली भाषा और संस्कृति के संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताते हुए भविष्य में भी ऐसे कार्यक्रम नियमित रूप से आयोजित करने की मांग की।
