जमशेदपुर : झारखंड की स्वास्थ्य व्यवस्था का एक ऐसा शर्मनाक चेहरा सामने आया है, जिसने सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच की गहरी खाई को उजागर कर दिया है। एक ओर गंभीर रूप से घायल बुजुर्ग जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष कर रहा था, वहीं दूसरी ओर अस्पताल परिसर में खड़ी दो-दो एम्बुलेंस मूकदर्शक बनी रही। आखिरकार परिजनों को मजबूर होकर घायल को ऑटो में बैठाकर अस्पताल पहुंचाना पड़ा।

मामला गोविंदपुर थाना क्षेत्र के घोड़ाबांधा नया रोड का है। सोमवार को हुए एक भीषण सड़क हादसे में गिट्टी लदे तेज रफ्तार डंपर ने बाइक सवार दो लोगों को अपनी चपेट में ले लिया। दुर्घटना इतनी भयावह थी कि 42 वर्षीय बाइक चालक की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि बाइक के पीछे बैठे 62 वर्षीय बुजुर्ग गंभीर रूप से घायल हो गए।
स्थानीय लोगों की मदद से घायल बुजुर्ग को घटनास्थल के समीप स्थित सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र ले जाया गया। चिकित्सकों ने प्राथमिक उपचार के बाद उनकी गंभीर स्थिति को देखते हुए तत्काल टाटा मोटर्स अस्पताल रेफर कर दिया। यहीं से शुरू हुई स्वास्थ्य व्यवस्था की वह कहानी, जिसने कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार अस्पताल परिसर में दो एम्बुलेंस मौजूद थे, लेकिन किसी कारणवश घायल को एम्बुलेंस उपलब्ध नहीं कराई गई। समय बीतता गया, घायल दर्द से कराहता रहा और परिजन मदद की गुहार लगाते रहे। जब कोई व्यवस्था नहीं हुई तो मजबूरन घायल बुजुर्ग को एक ऑटो में बैठाकर टाटा मोटर्स अस्पताल ले जाया गया।
यह घटना केवल एक घायल व्यक्ति की पीड़ा नहीं, बल्कि उस स्वास्थ्य तंत्र की संवेदनहीनता को दर्शाती है, जो अक्सर कागजों में तो बेहतर दिखाई देता है, लेकिन जरूरत के समय आम लोगों का साथ छोड़ देता है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब अस्पताल परिसर में एम्बुलेंस उपलब्ध थे, तो उनका उपयोग क्यों नहीं किया गया? क्या गंभीर मरीजों के लिए उपलब्ध संसाधन सिर्फ दिखावे के लिए हैं? यदि समय पर एम्बुलेंस सुविधा मिल जाती तो क्या घायल को बेहतर और त्वरित चिकित्सा सहायता नहीं मिल सकती थी?
सरकार और स्वास्थ्य विभाग अक्सर ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों में बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं के दावे करते हैं, लेकिन गोविंदपुर की यह घटना उन दावों की वास्तविकता को सामने लाती है। एक ओर करोड़ों रुपये स्वास्थ्य सुविधाओं पर खर्च किए जाने की बात कही जाती है, वहीं दूसरी ओर गंभीर रूप से घायल व्यक्ति को ऑटो में अस्पताल ले जाना पड़ता है।
यह मामला केवल एक दुर्घटना तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे स्वास्थ्य तंत्र की जवाबदेही और कार्यप्रणाली पर सवाल खड़ा करता है। स्थानीय लोगों ने घटना की जांच कर दोषियों के खिलाफ कार्रवाई तथा एम्बुलेंस सेवा की वास्तविक स्थिति सार्वजनिक करने की मांग की है।
गोविंदपुर की यह तस्वीर आज भी कई सवाल पूछ रही है—क्या आम आदमी की जान की कीमत इतनी कम हो गई है कि अस्पताल में एम्बुलेंस खड़ी रहने के बावजूद मरीज को ऑटो का सहारा लेना पड़े? क्या स्वास्थ्य व्यवस्था सिर्फ सरकारी रिपोर्टों और आंकड़ों तक सीमित होकर रह गई है?

