आजसू प्रवक्ता बोले—समर्पित कार्यकर्ताओं की अनदेखी कर दलबदल कर आने वाले नेताओं को तरजीह देना संगठन के लिए चिंतन का विषय
जमशेदपुर। राजनीति में विचारधारा का महत्व अधिक है या सत्ता और व्यक्तिगत स्वार्थ का? यह सवाल उठाते हुए आजसू प्रवक्ता अप्पू तिवारी ने भाजपा, झामुमो, कांग्रेस, आजसू समेत तमाम राजनीतिक दलों के नेतृत्व को आत्ममंथन करने की जरूरत बताई है। उन्होंने कहा कि आज राजनीतिक दलों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि संगठन के प्रति वर्षों से समर्पित कार्यकर्ताओं को उचित सम्मान और अवसर मिल रहा है या नहीं। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या नेताओं की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएं पार्टी की विचारधारा और कार्यकर्ताओं के योगदान पर भारी पड़ने लगी हैं?

अप्पू तिवारी ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर कहा कि किसी भी राजनीतिक संगठन की असली ताकत उसके समर्पित कार्यकर्ता होते हैं। यही कार्यकर्ता वर्षों तक पार्टी की विचारधारा को जन-जन तक पहुंचाते हैं, आंदोलनों में भाग लेते हैं, संघर्ष करते हैं और विपरीत परिस्थितियों में भी संगठन का झंडा बुलंद रखते हैं। इसके बावजूद जब पद और सत्ता में भागीदारी की बारी आती है, तो कई बार दूसरे दलों से आए नेताओं को प्राथमिकता मिलने की स्थिति सामने आती है। ऐसे में वर्षों से संगठन के लिए काम कर रहे कार्यकर्ताओं के मन में स्वाभाविक रूप से उपेक्षा का भाव पैदा होता है।
### दलबदल की राजनीति में कार्यकर्ताओं के योगदान का क्या होगा?……
आजसू प्रवक्ता ने कहा कि यह सवाल किसी एक राजनीतिक दल तक सीमित नहीं है, बल्कि राजनीति की उस कार्यशैली से जुड़ा है, जिसमें विचारधारा की तुलना में सत्ता के समीकरणों को अधिक महत्व मिलने की चर्चा होती है। उन्होंने कहा कि यदि वर्षों तक पार्टी के लिए मेहनत करने वाले कार्यकर्ता पद और सम्मान की प्रतीक्षा करते रहें, जबकि दूसरे दलों से आए नेताओं को तुरंत महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां मिल जाएं, तो संगठन के भीतर असंतोष पैदा होना स्वाभाविक है।
उन्होंने सवाल किया कि कार्यकर्ताओं की निष्ठा, संघर्ष और योगदान का मूल्यांकन आखिर कौन करेगा? क्या राजनीति केवल चुनाव लड़ने, सत्ता हासिल करने और पद प्राप्त करने तक सीमित रह जाएगी? क्या कार्यकर्ता सिर्फ भीड़ जुटाने, नारे लगाने और चुनाव के दौरान प्रचार करने के लिए रह जाएंगे?
### संगठन की मजबूती के लिए समर्पित कार्यकर्ताओं का सम्मान जरूरी……
अप्पू तिवारी ने कहा कि राजनीतिक दलों के नेतृत्व को यह समझना होगा कि संगठन की मजबूती केवल नेताओं के प्रभाव से नहीं, बल्कि विचारधारा, समर्पित कार्यकर्ताओं और जनता के विश्वास से तय होती है। जो कार्यकर्ता कठिन परिस्थितियों में भी पार्टी के साथ खड़े रहते हैं, उनके योगदान की अनदेखी कर किसी संगठन की दीर्घकालिक मजबूती सुनिश्चित नहीं की जा सकती।
उन्होंने कहा कि दलबदल करना किसी व्यक्ति का राजनीतिक निर्णय हो सकता है, लेकिन दूसरे दलों से आने वाले नेताओं को जिम्मेदारी सौंपते समय पुराने कार्यकर्ताओं के अनुभव, संघर्ष और समर्पण का भी उचित मूल्यांकन होना चाहिए। संगठन में नए लोगों को अवसर देने के साथ-साथ लंबे समय से जुड़े कार्यकर्ताओं के सम्मान और भविष्य का ध्यान रखना भी नेतृत्व की जिम्मेदारी है।
आंतरिक लोकतंत्र मजबूत करने की जरूरत……
आजसू प्रवक्ता ने कहा कि भाजपा, झामुमो, कांग्रेस और अन्य राजनीतिक दलों के नेतृत्व को इस बात पर गंभीरता से विचार करना चाहिए कि वे किस तरह की राजनीतिक संस्कृति को बढ़ावा दे रहे हैं। क्या राजनीति विचारधारा और जनसेवा के आधार पर आगे बढ़ेगी या सत्ता के समीकरणों के साथ बदलती राजनीतिक निष्ठाएं ही प्राथमिकता बनेंगी?
उन्होंने राजनीतिक दलों से संगठन में आंतरिक लोकतंत्र को मजबूत करने, समर्पित कार्यकर्ताओं को उचित अवसर देने और उनके योगदान का सम्मान सुनिश्चित करने की अपील की। उन्होंने कहा कि राजनीति में मतभेद होना, दल बदलना और सत्ता का आना-जाना लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है, लेकिन सिद्धांतों, जनसेवा और कार्यकर्ताओं के सम्मान को कमजोर नहीं पड़ने देना चाहिए।
### सत्ता से पद मिल सकता है, विश्वास संघर्ष से अर्जित होता है…..
अप्पू तिवारी ने कहा कि राजनीति का उद्देश्य केवल सत्ता प्राप्त करना नहीं, बल्कि समाज और आने वाली पीढ़ियों के लिए बेहतर राजनीतिक संस्कृति का निर्माण करना होना चाहिए। सत्ता के सहारे पद हासिल किया जा सकता है, लेकिन जनता का विश्वास और संगठन के प्रति समर्पण वर्षों के संघर्ष, सेवा और निष्ठा से अर्जित होता है।
उन्होंने कहा कि समय की मांग है कि सभी राजनीतिक दल आत्ममंथन करें और ऐसी व्यवस्था विकसित करें, जिसमें विचारधारा के साथ-साथ समर्पित कार्यकर्ताओं के योगदान को भी उचित महत्व मिले। इससे न केवल संगठन मजबूत होंगे, बल्कि राजनीति में जनसेवा, सिद्धांत और जवाबदेही की भावना को भी बढ़ावा मिलेगा।
