चाकुलिया : चाकुलिया प्रखंड अंतर्गत अंधेरिया गांव में रूनडा संक्रांति के अवसर पर आयोजित दो दिवसीय आदिवासी सांस्कृतिक मेला का समापन समारोह उत्साह, परंपरा और सामाजिक संदेशों के साथ संपन्न हुआ। मेले के अंतिम दिन मेला की संरक्षक एवं समाजसेवी डॉ. सुनीता देबदुत सोरेन विशेष रूप से उपस्थित रहीं। इस अवसर पर क्षेत्र के मुखिया मोहन सोरेन, AISF छात्र नेता विक्रम कुमार सहित बड़ी संख्या में ग्रामीण, युवा एवं सांस्कृतिक प्रेमी मौजूद रहे।
मेले के दौरान आयोजित पाता नाच प्रतियोगिता के विजेताओं को सम्मानित किया गया। प्रतियोगिता में प्रथम स्थान प्राप्त करने वाले दल को कप एवं 50 किलो पोल्ट्री, जबकि द्वितीय स्थान प्राप्त करने वाले दल को कप एवं 30 किलो पोल्ट्री देकर प्रोत्साहित किया गया। पुरस्कार वितरण के दौरान पूरे मेला परिसर में उत्साह और तालियों की गूंज सुनाई दी।
इस मौके पर मेला की संरक्षक डॉ. सुनीता देबदुत सोरेन ने अपने संबोधन में कहा कि आदिवासी समाज ने सदियों से प्रकृति, श्रम और सामूहिकता के सहारे अपनी पहचान बनाए रखी है। आज जरूरत है कि समाज शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और संगठन के क्षेत्र में और अधिक सशक्त होकर आगे बढ़े। उन्होंने कहा कि समाज को आत्ममंथन करते हुए उन आंतरिक विसंगतियों, कुरीतियों और रूढ़ियों को त्यागना होगा, जो प्रगति में बाधक हैं।
उन्होंने आगे कहा कि अंधविश्वास, आपसी विभाजन और निष्क्रियता को छोड़कर वैज्ञानिक सोच, सामाजिक एकता और संवैधानिक अधिकारों की समझ के साथ आगे बढ़ना ही समय की मांग है। तभी जल-जंगल-जमीन की रक्षा के साथ आने वाली पीढ़ियों के लिए सम्मानजनक, आत्मनिर्भर और उज्ज्वल भविष्य का निर्माण संभव होगा।
वहीं छात्र नेता विक्रम कुमार ने अपने ओजस्वी संबोधन में कहा कि आज हम यहां सिर्फ मेला लगाने नहीं आए हैं, बल्कि अपनी पहचान, अपनी संस्कृति और अपने अस्तित्व को जीवित रखने के लिए एकत्र हुए हैं। उन्होंने कहा कि आदिवासी संस्कृति कोई सजावट या स्टेज शो नहीं, बल्कि जल-जंगल-जमीन के साथ संतुलन की पूरी जीवन व्यवस्था है। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि विकास के नाम पर आदिवासियों से जमीन छीनी जा रही है, भाषाओं को दबाया जा रहा है और संस्कृति को पिछड़ा कहा जा रहा है। “जो समाज अपनी जड़ों को काटता है, वह कभी ऊंचा नहीं उड़ सकता,” कहते हुए उन्होंने युवाओं से अपनी भाषा और संस्कृति पर गर्व करने का आह्वान किया।
इस अवसर पर मुखिया मोहन सोरेन ने भी इस तरह के आयोजनों को सराहनीय बताते हुए कहा कि ऐसे सांस्कृतिक मेलों से समाज में एकजुटता बढ़ती है और नई पीढ़ी अपनी परंपराओं से जुड़ती है।
मेले के सफल आयोजन में आयोजक सरकार किस्कू और मोंटू किस्कू की अहम भूमिका रही। कार्यक्रम के अंत में सभी अतिथियों और ग्रामीणों ने मेला की सफलता पर प्रसन्नता व्यक्त की और इसे भविष्य में और व्यापक स्तर पर आयोजित करने की इच्छा जताई।
