लोकतंत्र सवेरा/जमशेदपुर : 23 फरवरी को मानगो नगर निगम का चुनाव है और सियासत अपने उफान पर है. आरोप-प्रत्यारोप, पोस्टर फाड़ा-फाड़ी, जीत-हार की भविष्यवाणी—सब कुछ चुनावी मौसम की तरह गरमा गया है. लेकिन इस बार एक नया “हथियार” खुलकर सामने आ गया है—एडिटेड ऑडियो और वीडियो।


सोशल मीडिया की गलियों में इन दिनों गाली-गलौज से भरे कथित ऑडियो-वीडियो वायरल हो रहे हैं। सवाल उठता है—आखिर चुनाव के वक्त ही ऐसे वीडियो क्यों सामने आते हैं? क्या यह वोटरों को प्रभावित करने की कोई सोची-समझी रणनीति है? या फिर सस्ती लोकप्रियता बटोरने का हथकंडा?
चुनावी मौसम में ही क्यों ‘वायरल वार’?……
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनाव के समय मतदाता का मूड सबसे ज्यादा संवेदनशील होता है। ऐसे में अगर किसी प्रत्याशी की छवि पर दाग लगाने का मौका मिल जाए तो विरोधी उसे भुनाने में देर नहीं करते। एडिटेड ऑडियो-वीडियो उसी रणनीति का हिस्सा माने जाते हैं—जहां आधा सच और आधा झूठ मिलाकर ऐसा नैरेटिव तैयार किया जाता है, जिससे जनता के मन में शंका पैदा हो जाए।
क्या यह ‘संजीवनी’ का काम करता है?……
कुछ नेताओं के समर्थक मानते हैं कि इस तरह के वायरल कंटेंट से माहौल बदल सकता है। लेकिन सच्चाई यह है कि आज का मतदाता पहले से ज्यादा जागरूक है। वह जानता है कि टेक्नोलॉजी के दौर में किसी की आवाज़ और चेहरा जोड़कर कुछ भी बनाया जा सकता है। ऐसे में उल्टा असर भी पड़ सकता है—जिसे बदनाम करने की कोशिश की जाए, उसे सहानुभूति मिल जाए।
गाली-गलौज की राजनीति… किस स्तर तक?…..
सबसे चिंता की बात यह है कि इन वायरल क्लिप्स में भाषा का स्तर बेहद गिरा हुआ है। सवाल यह भी है कि क्या चुनाव जीतने के लिए अब यही तरीका बचा है? क्या जनता को विकास, सड़क, नाली, पानी और बिजली के मुद्दों से भटकाकर ऐसे वीडियो के जरिए भावनाएं भड़काना ही राजनीति का नया ट्रेंड बन गया है?
पोस्टर से लेकर पिक्सल तक जंग……
मानगो में पहले आरोप प्रत्यारोप फिर पोस्टर फाड़ा फाड़ी और अब डिजिटल पोस्टर और एडिटेड वीडियो वायरल किए जा रहे हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि पहले दीवारें गंदी होती थीं, अब सोशल मीडिया की टाइमलाइन।
जनता क्या चाहती है?…….
मानगो की जनता का सीधा सवाल है—उन्हें साफ सड़क, बेहतर ड्रेनेज, पानी की नियमित आपूर्ति और पारदर्शी प्रशासन चाहिए। उन्हें गाली-गलौज का वायरल वीडियो नहीं, बल्कि ठोस विज़न चाहिए. चुनाव लोकतंत्र का पर्व है, लेकिन अगर यह पर्व “वायरल वार” में बदल जाए तो लोकतंत्र की आत्मा आहत होती है। एडिटेड ऑडियो-वीडियो भले कुछ समय के लिए सियासी हलचल मचा दें, लेकिन असली फैसला जनता के दिल और दिमाग में होता है. अब देखना यह है कि मानगो की जनता इन डिजिटल हथकंडों से प्रभावित होती है या विकास के मुद्दों पर अपना फैसला सुनाती है. चुनावी शोर में सच की आवाज़ कितनी बुलंद रहेगी—यह 23 फरवरी को मतपेटी बताएगी।
