सरायकेला खरसावां/चांडिल : पश्चिमी सिंहभूम विधानसभा के विधायक सरयू राय द्वारा विधानसभा में पूछे गए तारांकित प्रश्न के जवाब में हफ़ीज़ुल हसन, मंत्री, जल संसाधन विभाग, झारखंड सरकार द्वारा दिए गए उत्तर पर विस्थापित अधिकार मंच के अध्यक्ष राकेश रंजन महतो ने गंभीर प्रतिक्रिया व्यक्त की है।
राकेश रंजन महतो ने कहा कि स्वर्णरेखा बहुद्देशीय परियोजना के अंतर्गत बने चांडिल डैम से प्रभावित हजारों परिवार आज भी अपने अधिकारों से वंचित हैं। विधानसभा में दिए गए जवाब से यह स्पष्ट होता है कि कागजों पर भले ही कई कार्य पूरे दिखाए जा रहे हों, लेकिन वास्तविकता में अनेक विस्थापित परिवार आज भी मुआवजा, पुनर्वास और रोजगार जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि सरकार अब इस परियोजना को अगले एक से डेढ़ वर्ष के भीतर पूर्ण घोषित कर बंद करने की तैयारी कर रही है। ऐसे में यह बेहद जरूरी है कि सरकार पहले यह सुनिश्चित करे कि परियोजना से प्रभावित सभी परिवारों को उनका वैधानिक अधिकार मिले।



राकेश रंजन महतो ने सवाल उठाया कि क्या सभी विस्थापितों को उनकी जमीन का उचित मुआवजा मिल चुका है? क्या सभी लाभुकों को विकास पुस्तिका प्रदान की गई है? क्या विकास पुस्तिका के आधार पर मिलने वाली नौकरियों का लाभ सभी पात्र लोगों तक पहुंचा है? क्या पुनर्वास के लिए जमीन सभी विस्थापित परिवारों को उपलब्ध कराई गई है? और क्या स्वरोजगार से जुड़ी योजनाओं का लाभ वास्तव में हर प्रभावित परिवार को मिला है? उन्होंने कहा कि यदि इन सवालों का जवाब नकारात्मक है, तो यह स्पष्ट है कि परियोजना से जुड़े वादे अभी भी अधूरे हैं। ऐसे में परियोजना को बंद करने से पहले सरकार को विस्थापितों के सभी लंबित मुद्दों का समाधान करना चाहिए।
राकेश रंजन महतो ने यह भी कहा कि जब भी कोई व्यक्ति या संगठन विस्थापितों के अधिकारों के लिए आवाज उठाता है, तो कुछ लोग उसकी आलोचना या बदनामी करने में लग जाते हैं। लेकिन अब समय आ गया है कि सभी विस्थापित परिवार और संगठन आपसी रंजिश, मतभेद और भेदभाव को छोड़कर एकजुट हों।
उन्होंने सभी सामाजिक संगठनों, विस्थापित परिवारों और जनप्रतिनिधियों से अपील करते हुए कहा कि आने वाले एक से डेढ़ वर्ष हमारे लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इस दौरान हमें एकजुट होकर अपनी आवाज को मजबूत बनाना होगा, ताकि सरकार और विभाग को यह समझ में आए कि कागजों पर विकास दिखाने से वास्तविक समस्या समाप्त नहीं होती।
राकेश रंजन महतो ने एक और महत्वपूर्ण सवाल उठाते हुए कहा कि जिन विस्थापित परिवारों को पुनर्वास के तहत जमीन दी भी गई है, क्या वे वास्तव में उस जमीन के पूर्ण मालिक बन पाए हैं? कई मामलों में यह देखा गया है कि जमीन तो दे दी गई, लेकिन उसका वैध कागजी प्रमाण या रजिस्ट्रेशन आज तक नहीं कराया गया है। इसके कारण विस्थापित परिवार उस जमीन को दिखाकर बैंक से 50 हजार से लेकर 1 लाख रुपये तक का छोटा ऋण भी नहीं ले पा रहे हैं। उन्होंने कहा कि जब तक जमीन का पूरा कागजी स्वामित्व विस्थापितों को नहीं दिया जाता, तब तक पुनर्वास की प्रक्रिया अधूरी ही मानी जाएगी।
अंत में उन्होंने कहा कि यदि विस्थापितों को उनका पूरा अधिकार, न्यायपूर्ण मुआवजा, पुनर्वास और रोजगार नहीं मिलता है, तो विस्थापित समाज संगठित होकर लोकतांत्रिक तरीके से अपनी लड़ाई जारी रखेगा।



