लोकतंत्र सवेरा : बिहार ने एक बार फिर दिखा दिया कि लोकतंत्र की असली ताकत मतदान केंद्रों में ही बसती है। पहले चरण की वोटिंग में रिकॉर्ड तोड़ बंपर वोटिंग हुई है। लंबी कतारें और लोगों का उमड़ा जनसैलाब यह संकेत दे रहा है कि बिहार के मतदाता इस बार कुछ बड़ा सोच चुके हैं।
लेकिन सवाल यह है कि क्या यह बंपर वोटिंग विद्रोह की आग है या फिर वापसी की दस्तक…?
नीतीश कुमार ने कुछ महीनों पहले महिलाओं के खाते में 10 हजार रुपये की सहायता राशि भेजकर सीधा आधा बिहार जीतने की कोशिश की थी। और अगर मतदान केंद्रों पर महिलाओं की भीड़ को देखा जाए तो साफ लग रहा है कि महिला मतदाताओं ने इस चुनाव को निर्णायक बना दिया है।
अब चर्चाओं का दौर यही है —क्या वह 10 हजार रुपये महिला मसीहा बनकर लौटे हैं?
क्या वही राशि नीतीश कुमार की कुर्सी बचा लेगी? या फिर बिहार की महिलाएं अब विकास और सम्मान की नई राजनीति चाहती हैं?
दूसरी तरफ, तेजस्वी यादव ने इस चुनाव में युवाओं के दिल में आग लगा दी। “हर घर नौकरी” का नारा सैकड़ों बेरोजगार युवाओं के लिए उम्मीद की किरण बना। बिहार का युवा आज भी यही पूछ रहा है “कब तक जुमले सुनेंगे, अब नौकरी चाहिए!”
पहले चरण की वोटिंग में युवाओं की भारी भागीदारी यह संकेत दे रही है कि शायद इस बार युवा वर्ग सत्ता के नींव को हिला देने के मूड में है। बिहार का यह नया युवा न तो डरता है, न झुकता है बस चाहता है मौका और बदलाव।
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि इस बार बंपर वोटिंग का मतलब सिर्फ उत्साह नहीं, बल्कि असंतोष का संकेत भी हो सकता है।
नीतीश की “सुशासन” की छवि पर सवाल हैं, वहीं तेजस्वी का “रोजगार और नई सोच” का नारा लोगों को आकर्षित कर रहा है।
अब देखना यह होगा कि क्या यह बंपर वोटिंग नीतीश कुमार की वापसी की घंटी बजा रही है, या फिर तेजस्वी यादव के सत्ता के सपने को सच करने जा रही है।
अबकी बार बिहार ने चुपचाप वोट तो दिया है, लेकिन उसका हर वोट किसी तूफान की आहट लिए हुए है।
क्या 10 हजार की ‘कृपा’ भारी पड़ेगी या ‘हर घर नौकरी’ का सपना साकार होगा?
