जमशेदपुर : टाटा जी के सपनों से आकार लेने वाला जमशेदपुर कभी उद्योग, अनुशासन, मेहनत और सुरक्षित नागरिक जीवन की पहचान माना जाता था। लेकिन आज यही शहर अपराध की लगातार सामने आती घटनाओं के कारण एक ऐसे सवाल के सामने खड़ा है, जिसका जवाब सिर्फ पुलिस की कार्रवाई से नहीं, बल्कि पुलिसिंग की दिशा और रणनीति से जुड़ा है।

क्या अपराधियों के मन में कानून का डर पहले जैसा बचा है?…….
कहीं दिनदहाड़े बैंक में हथियारबंद लूट, कहीं सार्वजनिक स्थान पर गोलीबारी, कहीं गैंगवार की आहट, कहीं नशे का कारोबार और कहीं अपराधियों का बेखौफ अंदाज। घटनाएं अलग-अलग हो सकती हैं, लेकिन इन सबके बीच एक साझा चिंता दिखाई देती है—आम आदमी की सुरक्षा और कानून के इकबाल का सवाल।
24 सितंबर को गोलमुरी में दिनदहाड़े केनरा बैंक में हथियारबंद लूट की घटना ने शहर की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए। इसके महज दो दिन बाद सोनारी के एक मॉल स्थित रेस्तरां में गोलीबारी की घटना ने इस चिंता को और गहरा कर दिया। सार्वजनिक स्थानों पर इस तरह की घटनाएं सिर्फ पुलिस के लिए चुनौती नहीं हैं, बल्कि शहर के कारोबारी और आम नागरिक के भरोसे की भी परीक्षा हैं।
अपराध के बाद कार्रवाई या अपराध से पहले खौफ?……
अपराध होने के बाद अपराधी की गिरफ्तारी जरूरी है, लेकिन उससे भी जरूरी है कि अपराधी अपराध करने से पहले दस बार सोचे. पुलिस की कार्रवाई के आंकड़े अपनी जगह हैं। पूर्वी सिंहभूम पुलिस ने जुलाई-अगस्त के दौरान 1,883 शिकायतों में से 1,634 के निष्पादन का दावा किया है। सितंबर में पुलिस पदाधिकारियों के स्तर पर बड़े पैमाने पर तबादले भी हुए। कम्युनिटी पुलिसिंग और डिजिटल नागरिक सेवाओं की दिशा में भी पहल की जा रही है।
लेकिन जनता का सवाल इससे आगे है..
क्या पुलिस की मौजूदगी अपराध रोकने के लिए पर्याप्त है, या अपराधियों के नेटवर्क को उनकी जड़ तक जाकर तोड़ने की जरूरत है?
तीन दशक पहले का जमशेदपुर फिर क्यों याद आ रहा है?……
आज जब शहर अपराध के सवाल से जूझ रहा है, तब लगभग तीन दशक पुराना जमशेदपुर लोगों की स्मृतियों में लौट आता है. 1994 के दौर में जमशेदपुर भी अपराध और गैंगों की चुनौती से जूझ रहा था। इसी समय आईपीएस अधिकारी डॉ. अजय कुमार ने जमशेदपुर एसपी के रूप में जिम्मेदारी संभाली। वे 1994 से 1996 के बीच यहां एसपी रहे। समकालीन और बाद की मीडिया रिपोर्टों में उनके कार्यकाल को सख्त पुलिसिंग और अपराध नियंत्रण के दौर के रूप में याद किया गया. उनके कार्यकाल से जुड़ी चर्चाओं में यह भी सामने आता रहा है कि तत्कालीन टाटा स्टील एमडी जे.जे. ईरानी ने जमशेदपुर में सक्षम पुलिस नेतृत्व की जरूरत को लेकर तत्कालीन मुख्यमंत्री से आग्रह किया था।
डॉ. अजय कुमार की पुलिसिंग को लेकर अलग-अलग धारणाएं हो सकती हैं, लेकिन उनके कार्यकाल की सबसे प्रमुख पहचान यही रही कि अपराध नियंत्रण को पुलिसिंग के केंद्र में रखा गया।
आज सवाल फिर उठ रहा है…….
क्या जमशेदपुर को फिर किसी ‘सुपरकॉप’ की जरूरत है?
क्या शहर को फिर वैसी ही स्पष्ट, आक्रामक और परिणाम आधारित पुलिसिंग चाहिए, जिसमें अपराधियों को यह संदेश मिले कि कानून से खिलवाड़ की कीमत चुकानी पड़ेगी?
क्या पुलिस की इंटेलिजेंस व्यवस्था इतनी मजबूत हो कि गैंग सक्रिय होने से पहले उनकी गतिविधियों की जानकारी मिल जाए?
क्या हथियारों की सप्लाई, नशे के कारोबार, अवैध वसूली और अपराध से जुड़े आर्थिक नेटवर्क पर एक साथ प्रहार हो?
क्या अपराधियों के पीछे खड़े आर्थिक और स्थानीय नेटवर्क को भी जांच के दायरे में लाया जाए?
और क्या पुलिसिंग में ऐसी जवाबदेही तय हो कि थाने की सीमा अपराधियों के लिए सुरक्षा कवच नहीं, कानून की पहली दीवार बने?
सिर्फ तबादले नहीं, नतीजे चाहिए…….
पुलिस प्रशासन में तबादले व्यवस्था का हिस्सा हैं। लेकिन जनता को आखिरकार तबादलों की सूची नहीं, नतीजे चाहिए।
उसे चाहिए कि बैंक में पैसा रखने वाला ग्राहक सुरक्षित महसूस करे।
व्यापारी बाजार बंद करते समय भयभीत न हो।
परिवार सार्वजनिक स्थानों पर जाने से पहले गोलीबारी की खबरों के बारे में न सोचे।
युवाओं को नशे और अपराध के नेटवर्क से बचाया जा सके।
और सबसे महत्वपूर्ण अपराधी पुलिस की अगली कार्रवाई का इंतजार करने के बजाय पुलिस की रणनीति देखकर अपना रास्ता बदलने को मजबूर हों।
जमशेदपुर की पहचान अपराध नहीं हो सकती……
जमशेदपुर सिर्फ एक शहर नहीं है। यह देश के औद्योगिक इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय है। यहां उद्योग हैं, रोजगार है, व्यापार है, आर्थिक गतिविधियां हैं और लाखों लोगों की उम्मीदें जुड़ी हैं. इसलिए कानून-व्यवस्था का सवाल सिर्फ पुलिस का सवाल नहीं है। यह निवेश का सवाल है। रोजगार का सवाल है। व्यापार का सवाल है। और सबसे बढ़कर—नागरिक भरोसे का सवाल है. अगर शहर में अपराध का डर बढ़ता है तो उसकी चोट सिर्फ पीड़ित परिवार तक सीमित नहीं रहती। उसका असर बाजार, कारोबार और शहर की सामाजिक मानसिकता तक पहुंचता है।
अब जरूरत किस चीज की है?……
जरूरत सिर्फ पुलिस अधिकारियों के तबादलों की नहीं, जरूरत है मजबूत इंटेलिजेंस की, जरूरत है फास्ट रिस्पांस की, जरूरत है संगठित अपराध की आर्थिक रीढ़ पर चोट की, जरूरत है हथियार और नशे के नेटवर्क की तह तक पहुंचने की, जरूरत है प्रभावी सीसीटीवी निगरानी की, जरूरत है थाने स्तर पर जवाबदेही की, और सबसे बढ़कर जरूरत है ऐसी पुलिसिंग की, जिसमें आम आदमी थाने का दरवाजा खटखटाने से न डरे और अपराधी थाने का नाम सुनकर बेखौफ न रहे।
कड़वा सच……….
टाटा जी ने जिस जमशेदपुर की कल्पना की थी, उसकी पहचान अपराध नहीं थी. वह मेहनतकश लोगों का शहर था. वह उद्योग का शहर था. वह अनुशासन का शहर था. वह भरोसे का शहर था. इसलिए आज सवाल किसी एक अधिकारी या किसी एक सरकार से ज्यादा बड़ी व्यवस्था से है. क्या जमशेदपुर में कानून का इकबाल फिर उसी मजबूती से कायम किया जा सकता है? क्या अपराधियों के भीतर पुलिस और कानून का वास्तविक खौफ पैदा होगा? क्या पुलिसिंग सिर्फ घटना के बाद कार्रवाई करेगी या अपराध की जड़ तक पहुंचकर उसे रोकने की रणनीति भी बनाएगी? क्या जमशेदपुर को फिर किसी ‘सुपरकॉप’ की जरूरत है, या जरूरत है ऐसी पूरी पुलिसिंग व्यवस्था की, जिसमें किसी एक ‘सुपरकॉप’ पर निर्भर रहने की नौबत ही न आए? क्योंकि शहर किसी एक अधिकारी से सुरक्षित नहीं होता। शहर सुरक्षित होता है मजबूत सिस्टम, सटीक इंटेलिजेंस, त्वरित कार्रवाई और कानून के समान प्रभाव से. और यही वह कड़वा सच है, जिसे अब नजरअंदाज करना शहर के हित में नहीं होगा।
