जमशेदपुर : शहर में नागरिकों पर पुलिस द्वारा कथित लाठीचार्ज की घटना को लेकर सियासत गरमा गई है। पूर्व सांसद सह पूर्व आईपीएस डॉ. अजय कुमार ने घटना पर कड़ा ऐतराज जताते हुए सोशल मीडिया के माध्यम से पुलिस की कार्यशैली पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने वायरल वीडियो का हवाला देते हुए कार्रवाई को “अमानवीय और बर्बर” बताया और कहा कि वर्दी का उद्देश्य आम लोगों के मन में सुरक्षा और भरोसे का भाव पैदा करना है, भय पैदा करना नहीं. डॉ. अजय कुमार ने कहा कि अपराध नियंत्रण के लिए कानून में स्पष्ट प्रक्रियाएं निर्धारित हैं। ऐसे में आम नागरिकों के साथ मारपीट या अनावश्यक बल प्रयोग को स्वीकार नहीं किया जा सकता। उन्होंने पुलिस के उच्चाधिकारियों से पूरे मामले की जांच कर दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई करने की मांग की।

जब अपराधियों के लिए काल बने थे डॉ. अजय कुमार…..
जमशेदपुर में डॉ. अजय कुमार का पुलिसिंग कार्यकाल आज भी चर्चा में रहता है। 1994 से 1996 के बीच जमशेदपुर के एसपी के रूप में उन्होंने उस दौर में पुलिस की कमान संभाली थी, जब शहर में संगठित अपराध, रंगदारी और कथित माफिया गतिविधियों को लेकर कानून-व्यवस्था बड़ी चुनौती बनी हुई थी. उनके कार्यकाल को लेकर समर्थकों और मीडिया में उन्हें “सुपरकॉप” और “एनकाउंटर स्पेशलिस्ट” जैसे नामों से संबोधित किया गया। उनके समर्थकों के अनुसार, उनके कड़े पुलिस अभियान से अपराध जगत में पुलिस का दबदबा बढ़ा और कई अपराधियों पर कार्रवाई हुई।
स्क्रैप माफिया से लेकर रंगदारी तक पर कड़ा एक्शन…..
बताया जाता है कि टाटा स्टील के अनुरोध और तत्कालीन कानून-व्यवस्था की चुनौतियों के बीच डॉ. अजय कुमार को जमशेदपुर की कमान सौंपी गई थी। उनके कार्यकाल में स्क्रैप कारोबार से जुड़े अपराध, रंगदारी और संगठित आपराधिक गतिविधियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की गई। रंजीत आहूजा और विमल लोहार समेत कई चर्चित अपराधी पुलिस की कार्रवाई के दायरे में आए. उनके समर्थकों का दावा है कि इस दौर में अपराधियों पर पुलिस का दबाव बढ़ा और शहर में कानून-व्यवस्था को लेकर आम लोगों का भरोसा मजबूत हुआ।
पुलिस की लाठी नहीं, कानून का भरोसा दिखना चाहिए
वर्तमान घटना पर निशाना साधते हुए डॉ. अजय कुमार ने स्पष्ट किया कि कठोर पुलिसिंग और आम नागरिकों के साथ बर्बर व्यवहार में फर्क है। अपराधियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई जरूरी है, लेकिन आम जनता के साथ कानूनसम्मत और गरिमापूर्ण व्यवहार भी उतना ही महत्वपूर्ण है. अब सवाल यह है कि बिष्टुपुर की घटना में वास्तव में क्या हुआ, बल प्रयोग की परिस्थितियां क्या थीं और क्या पुलिस कार्रवाई निर्धारित नियमों के अनुरूप थी? इन सवालों का जवाब जांच और पुलिस के आधिकारिक पक्ष से ही स्पष्ट होगा. जमशेदपुर में पुलिसिंग को लेकर छिड़ी इस बहस ने एक बार फिर पुराने “सख्त पुलिसिंग” के दौर और आज की कानून-व्यवस्था के बीच तुलना को चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
