साक्ष्य के अभाव में अदालत ने सभी आरोपितों को किया दोषमुक्त, जांच और गवाहियों पर उठे सवाल
2017 के बहुचर्चित दंगा, आगजनी और पुलिस पर हमले के मामले में आया फैसला, लंबे मुकदमे के बाद मिली राहत
जमशेदपुर : वर्ष 2017 के बहुचर्चित मानगो दंगा मामले में करीब नौ वर्ष बाद अदालत ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए हाजी फिरोज खान समेत सभी 19 आरोपितों को बरी कर दिया। अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश कनकन पट्टेदार की अदालत ने शुक्रवार को साक्ष्यों के अभाव में सभी आरोपियों को दोषमुक्त घोषित किया। अदालत के इस फैसले ने मामले की जांच प्रक्रिया और अभियोजन पक्ष की तैयारी पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।



जानकारी के अनुसार, 19 मई 2017 को सरायकेला-खरसावां जिले के राजनगर क्षेत्र में बच्चा चोरी की अफवाह के बाद चार लोगों की पीट-पीटकर हत्या कर दी गई थी। इस घटना के विरोध में मुस्लिम एकता मंच की ओर से मानगो क्षेत्र में प्रदर्शन किया गया था। प्रदर्शन के दौरान कई स्थानों पर सड़क जाम, टायर जलाकर विरोध, पथराव, तोड़फोड़, आगजनी और पुलिस पर हमले की घटनाएं हुई थीं. घटना के बाद मानगो थाना में नामजद और अज्ञात लोगों के खिलाफ दंगा, सरकारी कार्य में बाधा, आगजनी, सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने और पुलिस पर हमला करने सहित विभिन्न धाराओं के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई थी। मामले की जांच के बाद 19 लोगों के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किया गया था।
आरोप साबित करने में विफल रहा अभियोजन पक्ष……
मुकदमे की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष की ओर से कई गवाह पेश किए गए, लेकिन अदालत में आरोपों को प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त और ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किए जा सके। बचाव पक्ष के अधिवक्ता जाहिद इकबाल ने अदालत में दलील दी कि जांच एजेंसियां आरोपों को साबित करने में पूरी तरह असफल रही हैं और अभियोजन पक्ष का मामला संदेह से परे आरोप सिद्ध नहीं कर सका. अदालत ने उपलब्ध दस्तावेजों, साक्ष्यों और गवाहियों की समीक्षा के बाद पाया कि आरोपितों के खिलाफ पर्याप्त प्रमाण मौजूद नहीं हैं। इसके बाद हाजी फिरोज खान सहित सभी 19 आरोपितों को बरी करने का आदेश दिया गया।
फैसले के बाद जांच प्रक्रिया पर उठे सवाल……
फैसले के बाद बचाव पक्ष ने कहा कि वर्षों तक मुकदमा झेलने वाले लोगों को आर्थिक, सामाजिक और मानसिक परेशानियों का सामना करना पड़ा। अधिवक्ता ने मामले की जांच में कथित कमियों की समीक्षा कराने तथा प्रभावित लोगों को उचित राहत और मुआवजा देने की मांग भी की. करीब नौ वर्षों तक चली न्यायिक प्रक्रिया के बाद आए इस फैसले के साथ 2017 के सबसे चर्चित मामलों में से एक का कानूनी अध्याय समाप्त हो गया। हालांकि, मामले में साक्ष्य जुटाने, जांच की गुणवत्ता और न्यायिक प्रक्रिया में हुई देरी को लेकर कई सवाल अब भी चर्चा का विषय बने हुए हैं।



