जमशेदपुर : ओडिशा के कटक स्थित विशेष सत्र अदालत ने प्रतिबंधित आतंकी संगठन अल-कायदा से कथित संबंध रखने के आरोप में गिरफ्तार इस्लामी विद्वान मौलाना अब्दुर्रहमान कटक़ी को करीब 10 वर्ष बाद बरी कर दिया है। अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया था, जिसे मंगलवार को सुनाया गया। फैसले के बाद मौलाना की जेल से रिहाई का रास्ता साफ हो गया है।



मामले में पिछले महीने Supreme Court of India ने सुनवाई के दौरान ट्रायल कोर्ट को दो माह के भीतर मुकदमे की प्रक्रिया पूरी करने का निर्देश दिया था। इसके बाद सुनवाई में तेजी आई और अभियोजन पक्ष ने जांच अधिकारियों सहित अन्य गवाहों के बयान दर्ज कराए। अदालत ने आरोपी का धारा 313 के तहत बयान लेने के बाद अंतिम बहस सुनी और फैसला सुरक्षित रख लिया था।
मौलाना अब्दुर्रहमान कटक़ी के खिलाफ दिल्ली, जमशेदपुर और कटक में अलग-अलग मामले दर्ज किए गए थे। उन पर अल-कायदा से जुड़े होने के गंभीर आरोप लगाए गए थे। इस पूरे मामले की कानूनी पैरवी जमीयत उलेमा महाराष्ट्र की लीगल सहायता समिति की ओर से की गई।
सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता नित्या रामकृष्णन ने पक्ष रखते हुए कहा था कि अभियोजन पक्ष के कई गवाह अपने पुराने बयानों से मुकर चुके हैं, इसके बावजूद आरोपी को वर्षों तक जेल में रखा गया। हालांकि अदालतों ने गंभीर आरोपों का हवाला देते हुए मौलाना की जमानत याचिकाएं कई बार खारिज कर दी थीं। जमीयत की ओर से हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में कई बार अपील भी की गई, लेकिन तत्काल राहत नहीं मिल सकी।
फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए मौलाना अरशद मदनी ने कहा कि यह निर्णय साबित करता है कि बिना पर्याप्त सबूतों के मुस्लिम युवाओं को आतंकवाद के मामलों में फंसाकर उनकी जिंदगी बर्बाद की जाती रही है। उन्होंने कहा कि मौलाना अब्दुर्रहमान को न्याय मिलने में पूरे 10 वर्ष लग गए, जो बेहद पीड़ादायक और चिंताजनक है।
उन्होंने जांच एजेंसियों की जवाबदेही तय करने की मांग करते हुए कहा कि जब तक निर्दोष लोगों को फंसाने वालों पर कार्रवाई नहीं होगी, तब तक ऐसे मामलों की पुनरावृत्ति होती रहेगी। वहीं मौलाना हलीमुल्लाह कासमी ने फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि एक दशक लंबी कानूनी लड़ाई के बाद आखिरकार मौलाना को न्याय मिला है। उन्होंने कहा कि यह मुकदमा आसान नहीं था, लेकिन जमीयत लगातार अदालतों में मजबूती से पैरवी करती रही।



