नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को पश्चिम बंगाल में विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision-SIR) प्रक्रिया के दौरान मतदाता सूची से हटाए गए नामों से जुड़े मामलों में चुनाव आयोग, पश्चिम बंगाल सरकार और राज्य चुनाव आयोग से जवाब तलब किया है। अदालत ने यह निर्देश उस जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई के दौरान दिया, जिसमें हटाए गए मतदाताओं द्वारा दायर दावों और आपत्तियों का विधानसभा क्षेत्रवार आंकड़ा सार्वजनिक करने की मांग की गई है।

मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने की। यह जनहित याचिका पश्चिम बंगाल प्रदेश कांग्रेस कमेटी की SIR समिति के अध्यक्ष प्रसेनजीत बोस की ओर से दायर की गई है. याचिका में अधिवक्ता नेहा राठी ने मांग की है कि SIR प्रक्रिया से जुड़े विधानसभावार आंकड़े सार्वजनिक किए जाएं। इसमें फॉर्म-6 एवं फॉर्म-7 के तहत प्राप्त आवेदनों, स्वीकार एवं अस्वीकार किए गए दावों तथा अपीलीय ट्रिब्यूनलों में लंबित और निस्तारित मामलों का पूरा विवरण उपलब्ध कराने की मांग की गई है।
33.5 लाख अपीलें लंबित, 70 प्रतिशत दावे स्वीकार……
याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकर नारायणन ने अदालत को बताया कि हटाए गए मतदाताओं के दावों और आपत्तियों की सुनवाई के लिए गठित 18 ट्रिब्यूनलों की कार्यप्रणाली में गंभीर व्यावहारिक दिक्कतें और देरी है. उन्होंने कहा कि करीब 33.5 लाख अपीलें अभी भी लंबित हैं, जबकि जिन मामलों का निपटारा हो चुका है, उनमें लगभग 70 प्रतिशत दावे स्वीकार किए गए हैं। उनका कहना था कि अपीलों का फैसला होने तक प्रभावित लोगों को सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) और अन्य सरकारी योजनाओं के लाभ से वंचित रहना पड़ता है।
चुनाव आयोग नागरिकता तय नहीं कर सकता : सुप्रीम कोर्ट…….
सुनवाई के दौरान पीठ ने बिहार SIR मामले में दिए गए अपने पूर्व निर्णय का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि कोई ट्रिब्यूनल किसी व्यक्ति को SIR सूची में शामिल किए जाने योग्य नहीं मानता है, तो चुनाव आयोग को नागरिकता अधिनियम के तहत नागरिकता तय करने के लिए मामला केंद्र सरकार के संबंधित मंत्रालय को भेजना होगा. अदालत ने स्पष्ट किया कि चुनाव आयोग नागरिकता तय करने वाली संवैधानिक प्राधिकरण नहीं है। उसका अधिकार केवल मतदाता सूची के नियंत्रण, पर्यवेक्षण और संशोधन तक सीमित है।
58 लाख से अधिक नाम हटाने का दावा……
याचिका में संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 के तहत मौलिक अधिकारों के संरक्षण की मांग की गई है। इसमें दावा किया गया है कि पश्चिम बंगाल में SIR प्रक्रिया के दौरान 58 लाख से अधिक मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए. याचिका के अनुसार, दावे और आपत्तियों के चरण में नाम जोड़ने के लिए 9.64 लाख आवेदन (फॉर्म-6 एवं 6A) तथा नाम हटाने के लिए 99 हजार से अधिक आवेदन (फॉर्म-7) प्राप्त हुए थे। इसके बावजूद 28 फरवरी को प्रकाशित अंतिम मतदाता सूची में केवल 1.82 लाख नए नाम ही जोड़े गए।
25 अगस्त को होगी अगली सुनवाई……
सुप्रीम कोर्ट ने इस जनहित याचिका को पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा दायर SIR संबंधी लंबित याचिकाओं के साथ जोड़ते हुए 25 अगस्त को अगली सुनवाई निर्धारित की है।
(समाचार एजेंसी पीटीआई के इनपुट के साथ)

