लेखक सुभाष शाह की कलम से : अति प्राचीन आदिम मानव कविलाई समाज, दासयुग और सामंती एवं सामंती सम्राज्यवादी युगो में बर्बररता समान्य प्रक्रियाएं थी, लेकिन इस बर्बर युग के गर्भ में ही सभ्ययुग का भ्रूण पड़ चूका था। लेकिन पूँजीवादी क्रांति से पूँजीवादी संस्कृती उत्पन्न होती है और पूँजीवादी संस्कृती अपने पूर्व समाज व्यवस्थाओं से प्राप्त बर्बरता के विरुद्ध संघर्ष कर सभ्य युग की स्थापना को दीशा में अग्रसर होती है।
इसके परिणाम स्वरूप क्रमिक रूप से कई कई एक देश में पूँजीवादी (जनवादी, नवजनवादी) क्रांतियां होती हैं। इसी विकास क्रम में समाजवादी संस्कृति का भूण, पूँजीवादी गर्भ में पड़ता है। अंततः पूँजीवादी देशों की प्रतिस्पधाएँ पूँजीवादी-सम्राज्यवाद को जन्म देती है और देखने ही देखते (कालानात्मक तुलना) पूरा विश्व पूँजीवादी क्रिया का अंग बन जाता है। और और मातहत हो जाती हैं सभी बर्बरी युगीन समाज व्यवस्थाएँ (क़बीलाई, दासयुग, सामंती, अर्ध पूंजीवादी, अर्ध सामंती)
फ़लत जिन देशों में पूँजीवादी-क्रांति होती हैं, वहाँ बर्बरता पर पूरी तरह या कमोबेशी लगाम संभव हो पाता है और जहां पूंजीवादी क्रांति नहीं होती है, वहाँ क्रमबद्ध तरीके से बर्बरता विद्यमान रहती है। जहाँ का सामाजिक व्यवस्था, कबिलाई समाज व्यवस्था या कविलाई समाज व्यवस्था से अधिक जुड़ाव है, वहाँ आज भी बर्बर संस्कृति है, जो सारी दुनिया के लिए एक खतरनाक परिस्थिति पैदा करती है।
जिन देशों की समाज व्यवस्था, सामंती समाज व्यवस्था है, वहाँ भी कविलाई समाज व्यवस्था की तुलना में कम लेकिन बर्बर संस्कृति है। और उन देशों में कमजोर पूंजीवादी समाज व्यवस्था कमजोर विद्रूप अवस्था में सामंती संस्कृति के आवरण से ढकी हुई है।
अत: ऐसे देशों में बर्बर संस्कृति उबाल पर है। ऐसी बर्बर-संस्कृती ऐटमी ताकतों से नही मिटाई जा सकती है, बल्कि वहाँ पूँजीवादी क्रांतियां या संक्रमण अत्यंत आवश्यक है, जिससे सम्राज्यवादी देशों को अधिक से अधिक बाजार मिल पाएगा और साम्राज्यवादी (पूंजीवादी) युद्धों का शिकार दुनिया कम होगी लेकिन मुक्ति नही मिल पाएगी।
भारत और अरब के देशों, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, बर्मा, श्रीलंका, बांग्लादेश आदि आदि देशों को बर्बरता से बाहर तब तक नहीं किया सकता है, जबतक कि वहां पूँजीवादी क्रांति या संक्रमण नहीं होगी।
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