जमशेदपुर: झारखंड की समृद्ध जनजातीय कला और सांस्कृतिक विरासत से युवाओं को जोड़ने के उद्देश्य से रविवार, 11 अक्टूबर को जमशेदपुर के कैफे रीगल में दूसरी सोहराय कला कार्यशाला का आयोजन किया गया. तीन घंटे तक चली इस कार्यशाला में विभिन्न सामाजिक और व्यावसायिक पृष्ठभूमि से जुड़े 25 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया और सोहराय चित्रकला की पारंपरिक तकनीकों को करीब से समझा. इससे पहले 9 अगस्त को आयोजित पहली कार्यशाला को भी उत्साहजनक प्रतिक्रिया मिली थी. इस कार्यशाला का आयोजन इंजीनियर एवं सामुदायिक आयोजक अमरनाथ योगी ने दृश्य कलाकार अर्नब कुमार कोले, पीपल ऑफ जमशेदपुर और द हाइप एंटरटेनमेंट (THE) के सहयोग से किया. कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य प्रतिभागियों को सोहराय कला के इतिहास, सांस्कृतिक महत्व, प्रतीकों और चित्रांकन की पारंपरिक पद्धतियों से परिचित कराना था.

कार्यशाला के दौरान प्रतिभागियों को सोहराय चित्रकला में इस्तेमाल होने वाले प्राकृतिक रंगों और पारंपरिक सामग्रियों की जानकारी दी गई. कलाकार अर्नब कुमार कोले ने लोककथाओं, ऐतिहासिक संदर्भों और विभिन्न चित्रात्मक आकृतियों के पीछे छिपे अर्थों को विस्तार से समझाया. इसके बाद उन्होंने चित्र बनाने की तकनीक, रंगों के इस्तेमाल और पारंपरिक आकृतियों का प्रदर्शन किया. प्रतिभागियों ने उनके मार्गदर्शन में स्वयं चित्र बनाकर इस कला का अनुभव किया. सोहराय झारखंड की प्रमुख पारंपरिक लोककलाओं में से एक है, जिसका संबंध फसल उत्सव और ग्रामीण जीवन से जुड़ी सांस्कृतिक परंपराओं से है. इस कला में पारंपरिक रूप से मिट्टी की दीवारों पर प्राकृतिक रंगों के माध्यम से पशु-पक्षियों, पेड़-पौधों, प्रकृति और दैनिक जीवन से प्रेरित आकृतियां उकेरी जाती हैं. झारखंड की सोहराय चित्रकला को भौगोलिक संकेतक (जीआई) टैग भी प्राप्त है, जो इसकी विशिष्ट क्षेत्रीय पहचान और सांस्कृतिक महत्व को रेखांकित करता है.
कार्यशाला की शुरुआत परिचयात्मक सत्र से हुई. इसके बाद सोहराय कला के इतिहास और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि पर चर्चा की गई. अर्नब कुमार कोले ने प्रतिभागियों को कला की बारीकियों से अवगत कराया और उन्हें अपने-अपने चित्र तैयार करने में मार्गदर्शन दिया. इस दौरान डॉक्टरों, कलाकारों, विद्यार्थियों, नौकरीपेशा लोगों और जनजातीय समुदायों के सदस्यों ने भाग लिया. अलग-अलग क्षेत्रों से आए लोगों की भागीदारी ने कला के माध्यम से सांस्कृतिक संवाद और आपसी जुड़ाव का अवसर प्रदान किया. कार्यशाला का नेतृत्व करने वाले अर्नब कुमार कोले इंजीनियर होने के साथ-साथ दृश्य कलाकार भी हैं. उन्हें फाइन आर्ट्स और मिक्स्ड मीडिया के क्षेत्र में 15 वर्षों से अधिक का अनुभव है. हाल ही में उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित ‘वन स्टेट वन आर्टिस्ट’ (OSOA) लोक कला शिखर सम्मेलन में झारखंड की सोहराय कला का प्रतिनिधित्व किया. वे सोहराय की पारंपरिक तकनीकों और प्रतीकों का अध्ययन करने के साथ-साथ लोगों को इसका प्रशिक्षण भी देते हैं. उनकी कार्यशालाओं का उद्देश्य पारंपरिक कला को नई पीढ़ी तक पहुंचाना और इसे समकालीन समाज के लिए अधिक सुलभ बनाना है.
आयोजक अमरनाथ योगी ने कहा कि पहली कार्यशाला को मिली सकारात्मक प्रतिक्रिया के बाद दूसरी कार्यशाला आयोजित करने का निर्णय लिया गया. उन्होंने कहा, “हम चाहते थे कि लोग सोहराय कला को केवल देखें नहीं, बल्कि इसे स्वयं बनाकर भी अनुभव करें. इस बार युवाओं की भागीदारी और उनका उत्साह काफी उत्साहजनक रहा. प्रतिभागियों ने कला से जुड़ी कहानियों, रंगों और परंपराओं को लेकर कई सवाल पूछे. उनकी जिज्ञासा और सीखने की इच्छा ने इस कार्यशाला को हमारे लिए और भी सार्थक बना दिया.” कार्यशाला के अंत में प्रतिभागियों ने सोहराय कला की कुल 25 कलाकृतियां तैयार कीं. सभी प्रतिभागियों को सहभागिता प्रमाणपत्र प्रदान किए गए और वे अपनी बनाई कलाकृतियां भी अपने साथ ले गए. इस अनुभव के माध्यम से उन्हें झारखंड की पारंपरिक चित्रकला की तकनीकों के साथ-साथ उसकी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को समझने का अवसर मिला. आयोजकों ने भविष्य में भी इस तरह की कार्यशालाएं और सांस्कृतिक गतिविधियां आयोजित करने की योजना बनाई है. इसका उद्देश्य विशेष रूप से युवाओं को झारखंड की कला, संस्कृति और जनजातीय विरासत से जोड़ना तथा पारंपरिक कलाओं के संरक्षण और प्रचार-प्रसार को प्रोत्साहित करना है।
