जमशेदपुर : कभी एशिया की सबसे प्रतिष्ठित औद्योगिक इकाइयों में शुमार रही केबुल कंपनी आज अपने आखिरी सांसें गिन रही है। करीब ढाई दशक से भी अधिक समय से बंद पड़ी यह फैक्ट्री अब वीरान, जर्जर और पूरी तरह बर्बाद हो चुकी है। कंपनी के अंदर का दृश्य इतना भयावह है कि पहली नज़र में यह किसी डरावनी फिल्म के सेट जैसा दिखाई देता है।
दम तोड़ती दीवारें… जर्जर इमारतें… और हर ओर पसरा सन्नाटा…..
कभी हजारों लोगों की रोज़ी का सहारा रही इस कंपनी की इमारतें आज मानो ढहने की कगार पर खड़ी हैं। दीवारों में दरारें, टूटी छतें, उखड़ा लोहा और हर जगह फैला मलबा—यह सब किसी बड़ी अनहोनी की चेतावनी देता है। स्थानीय लोग बताते हैं कि अंदर दाखिल होने पर ऐसा लगता है जैसे किसी खौफनाक वीराने में पहुँच गए हों।
बंद होने के बाद कंपनी बन गई ‘चोरों का अड्डा’…..
कंपनी बंद होने के बाद से यहां चोरी, लूट, सांठगांठ और अवैध गतिविधियों का बोलबाला रहा है। चोरों ने कंपनी को दीमक की तरह खोखला कर दिया है। मशीनें, कीमती पार्ट्स, लोहमटेरियल — जो भी हाथ लगा, सब सुनियोजित तरीके से उठाकर ले जाया गया। स्थानीय लोग इसे मज़ाक में नहीं, बल्कि आक्रोश में “चोरी का तीर्थस्थल” कहने लगे हैं।
प्रशासनिक उदासीनता पर सवाल…..
फैक्ट्री की सुरक्षा और रखरखाव की जिम्मेदारी किसकी है—इस पर वर्षों से सवाल उठते रहे हैं, लेकिन हालात जस के तस हैं। इधर, कंपनी की जर्जर हालत और अंदर बढ़ती आपराधिक गतिविधियों को देखते हुए प्रशासन पर कड़े कदम उठाने का दबाव बढ़ता जा रहा है।
लोगों की भावनाएं जुड़ी थीं इस कंपनी से….
एक समय था जब यह कंपनी पूरे जमशेदपुर की औद्योगिक पहचान मानी जाती थी। हजारों परिवारों की आजीविका इससे जुड़ी थी। आज उसकी ये बर्बादी देखकर स्थानीय लोगों में निराशा, गुस्सा और दर्द साफ नजर आता है।
