लेखक सुभाष शाह…..
किसान है, जमीन है।
बीच में दलाल और शैतान।
कर्ता कारक किसान, संज्ञा जमीन।
खाद्य अपना, बीज अपना और अपना खून पसीना।
जमीन, पानी, हवा, धूप प्रक्रिया का।
जो भी मिला अनन – फल है, घाटा और लाभ नहीं।
लंथ, काम चोर, हराम खोर गुर्राया।
पूरा जंगल शक्ति शाली शहर का।
जमीन – गुंडा, मवाली, साइटें – जमींदार का।
यही कानून जंगल राज का।
हड्डी छोड़ रहा हु, बना रहे ढांचा तुम्हारा।
खून पीने दो, मांस खाने दो।
तुम भी जियो, हम जीवे।
जुल्मी जमींदारी, राज महाराजा।
एक चौथाई जुल्मी का, शेष किसान का।
ना घाटा न लाभ था।
आत्महत्या का ना कही नाम था।
नाम में बेइमानी, किसान के, क्योंकि वह जमींदार है।
खेतिहर मजदूर, खेत पर करता काम, वही किसान है।
मत लो आड़, किसान के नाम का।
लाज शर्म छोड़ो, जय बोलो जमींदार का।
सरकारी इनाम जमींदार के नाम।
मत करो बदनाम – किसान का।
तेरे एम एस पी में कितना हिस्सा खेतिहर मजदूर का?
फिर क्यों मचाते शोर किसान किसान का?
ओ जमाना लद गया, जब श्रम किसान का, बीज, खाद्य, हल –
बैल और पानी किसान का, फोकट का हकदार जमींदार था।
फसल कम हो, तो रोना लागत का, अतिउत्पादन से रोना भाव का।
तुम अपने ही फंदे से लटके हो।
गरीब किसानों को – ना रोना लागत का,
ना रोना अतिउत्पादन का।
अतिउत्पादन पर करता नाच।
बुरी व्यवस्था का बुरा हाल।
हक! लौटाव भूमिहीन किसानों का।
हक! लौटाव खेतिहर मजदूरों का।
बिना इसके विश्व – गुरु, देखी – सपना।
थी मूल मंत्र – विकसित देशों का।
