राँची : राज्य सरकार की महत्वाकांक्षी ‘अबुआ आवास योजना’ वर्तमान में वित्तीय संकट और प्रशासनिक सुस्ती की दोहरी मार झेल रही है। आंकड़ों के मुताबिक, योजना की रफ्तार बनाए रखने के लिए जहाँ 1000 करोड़ रुपये की तत्काल आवश्यकता थी, वहीं विभाग को मात्र 300 करोड़ रुपये ही प्राप्त हुए हैं। बजट की इस भारी किल्लत ने राज्य भर में हजारों गरीब परिवारों के सपनों पर पानी फेर दिया है।


















पुराना घर टूटा, नया अब तक अधूरा
योजना के तहत पहली और दूसरी किश्त मिलने के बाद हजारों लाभार्थियों ने अपने पुराने मिट्टी के घरों को तोड़कर पक्के मकान का निर्माण शुरू किया था। लेकिन अब तीसरी और चौथी किश्त न मिलने के कारण काम बीच में ही लटक गया है। स्थिति यह है कि कई जिलों में लोग भीषण गर्मी और आने वाले मानसून के डर से तिरपाल के नीचे रहने को मजबूर हैं।
मुख्य आंकड़े और चुनौतियां:
- फंड की कमी: मांग के मुकाबले केवल 30% राशि ही उपलब्ध हो पाई है, जिससे निर्माण कार्यों की गति धीमी हो गई है।
- अधूरे लक्ष्य: सरकार ने 2027 तक 20 लाख घर बनाने का लक्ष्य रखा है, लेकिन वर्तमान रफ्तार को देखते हुए यह लक्ष्य काफी दूर नजर आ रहा है।
- मजदूरी का भुगतान: कई क्षेत्रों में मनरेगा के तहत मिलने वाली मजदूरी के भुगतान में भी देरी की खबरें सामने आ रही हैं।
विपक्ष के निशाने पर सरकार
इस मुद्दे को लेकर राज्य की सियासत भी गरमा गई है। विपक्ष का आरोप है कि सरकार केवल प्रचार में जुटी है, जबकि धरातल पर फंड के अभाव में काम ठप पड़ा है। वहीं, विभागीय अधिकारियों का कहना है कि शेष राशि के आवंटन के लिए प्रक्रिया जारी है और जल्द ही अगली किश्त जारी की जाएगी।
“हमने सरकार के भरोसे अपना आशियाना तोड़ दिया, अब आधी-अधूरी दीवारों के बीच हम और हमारा परिवार छत का इंतजार कर रहे हैं।” > — एक पीड़ित लाभार्थी
अब देखना यह होगा कि सरकार इस फंड की कमी को कितनी जल्दी दूर करती है ताकि ‘अबुआ आवास’ सचमुच गरीबों का अपना घर बन सके।
