जमशेदपुर : कर्मचारी राज्य बीमा निगम (ESIC) की गोलमुरी शाखा, जमशेदपुर से जुड़े कथित भ्रष्टाचार, कदाचार, दुर्व्यवहार और अधिकारों के दुरुपयोग की शिकायतों ने अब गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। वर्ष 2025-26 के दौरान तत्कालीन ब्रांच मैनेजर सचित कुमार और तत्कालीन सोशल सिक्योरिटी ऑफिसर रवि शंकर के खिलाफ करीब 16-17 शिकायतकर्ताओं द्वारा विभिन्न आरोपों को लेकर शिकायत किए जाने का मामला सामने आया है. मामले को लेकर शिकायतकर्ता ने प्रमुखता से आवाज बुलंद करते हुए पूरे प्रकरण की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच की मांग की है। उनका कहना है कि जब किसी सरकारी अधिकारी के खिलाफ लगातार कई शिकायतें सामने आती हैं, तो महज विभागीय स्तर की औपचारिक जांच पर्याप्त नहीं हो सकती। ऐसे मामलों में निष्पक्ष जांच के जरिए सच्चाई सामने लाना जरूरी है।

शिकायतकर्ता को ही कानूनी नोटिस भेजे जाने पर उठे सवाल…….
इस पूरे मामले में सबसे गंभीर सवाल उस घटनाक्रम को लेकर उठाया जा रहा है, जिसमें शिकायतों का सामना कर रहे अधिकारियों की ओर से कथित तौर पर शिकायतकर्ता को ही अधिवक्ता के माध्यम से कानूनी नोटिस भेजे जाने की बात सामने आई है. शिकायतकर्ता ने सवाल उठाया कि यदि कोई व्यक्ति किसी सरकारी अधिकारी के खिलाफ शिकायत करता है, तो क्या शिकायत करना उसके अधिकार का हिस्सा नहीं है? उन्होंने मांग की कि पूरे घटनाक्रम की जांच कर यह स्पष्ट किया जाए कि शिकायतकर्ता को शिकायत वापस लेने अथवा भविष्य में शिकायत करने से रोकने के लिए किसी तरह का दबाव बनाया गया या नहीं. इसके साथ ही यह भी जांच का विषय है कि कहीं किसी सरकारी पद, प्रभाव अथवा विभागीय अधिकार का इस्तेमाल व्यक्तिगत विवाद में तो नहीं किया गया।
27 अगस्त की जांच को बताया अहम कड़ी……
बताया गया है कि 27 अगस्त को ESIC की जांच टीम के जमशेदपुर पहुंचने पर शिकायतकर्ता ने अपनी शिकायतों का सत्यापन/अटेस्टेशन कराते हुए उपलब्ध दस्तावेज, साक्ष्य एवं प्रमाण प्रस्तुत किए. शिकायतकर्ता का कहना है कि ऐसी स्थिति में जांच प्रक्रिया को पूरी तरह निष्पक्ष, पारदर्शी और दबावमुक्त रखा जाना चाहिए, ताकि शिकायतों की वास्तविकता सामने आ सके।
शिकायतकर्ता को डराने के बजाय शिकायत की जांच हो….
शिकायतकर्ता ने कहा कि यदि किसी शिकायत में तथ्य नहीं हैं तो निष्पक्ष जांच के बाद संबंधित अधिकारी स्वयं निर्दोष साबित हो सकते हैं। लेकिन यदि जांच में आरोप प्रथमदृष्टया सही पाए जाते हैं, तो जिम्मेदारी तय करते हुए कार्रवाई भी होनी चाहिए. उन्होंने कहा कि किसी शिकायतकर्ता को हतोत्साहित अथवा भयभीत करने के बजाय शिकायत के तथ्यों और दस्तावेजों की जांच करना ही लोकतांत्रिक एवं प्रशासनिक व्यवस्था की सही प्रक्रिया है. उनके अनुसार यह मामला केवल कुछ अधिकारियों और शिकायतकर्ताओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सरकारी संस्थानों में जवाबदेही, पारदर्शिता और शिकायतकर्ता के अधिकारों से जुड़ा महत्वपूर्ण विषय है।
CBI जांच की मांग, सात बिंदुओं पर कार्रवाई की अपील…..
मामले की गंभीरता और शिकायतों की संख्या को देखते हुए शिकायतकर्ता की ओर से पूरे प्रकरण की स्वतंत्र जांच, जिसमें CBI जांच पर विचार भी शामिल है, की मांग की गई है। साथ ही निम्न बिंदुओं पर कार्रवाई की मांग उठाई गई है—
1. पूरे प्रकरण की स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच कराई जाए।
2. शिकायतों, दस्तावेजों और प्रस्तुत साक्ष्यों का स्वतंत्र रूप से सत्यापन किया जाए।
3. शिकायतकर्ताओं को किसी भी प्रकार के दबाव, प्रताड़ना या प्रतिशोध से सुरक्षा दी जाए।
4. जांच की जाए कि क्या किसी अधिकारी ने अपने पद या विभागीय अधिकार का कथित दुरुपयोग किया।
5. शिकायतकर्ता को भेजे गए कानूनी नोटिस की परिस्थितियों और उद्देश्य की भी जांच हो।
6. आरोप प्रमाणित होने पर संबंधित अधिकारियों के खिलाफ नियमानुसार कठोर विभागीय एवं कानूनी कार्रवाई की जाए।
7. ESIC मुख्यालय और सक्षम प्राधिकारी यह सुनिश्चित करें कि भविष्य में कोई भी अधिकारी अपने पद की शक्ति का इस्तेमाल शिकायतकर्ताओं को हतोत्साहित करने के लिए न कर सके।
पद बड़ा हो सकता है, कानून से बड़ा कोई नहीं…..
शिकायतकर्ता ने कहा कि सरकारी पद जनता की सेवा और कानून के पालन के लिए होता है, व्यक्तिगत दबदबा कायम करने के लिए नहीं।
शिकायतकर्ता ने ESIC मुख्यालय और भारत सरकार से पूरे प्रकरण का निष्पक्ष, पारदर्शी और समयबद्ध परीक्षण कराने की मांग की है। साथ ही कहा कि यदि जांच में किसी अधिकारी द्वारा पद की गरिमा या अधिकारों के दुरुपयोग की पुष्टि होती है, तो ऐसी कार्रवाई होनी चाहिए जिससे भविष्य में किसी भी अधिकारी को अपने पद का कथित दुरुपयोग करने का अवसर न मिले. हालांकि, संबंधित अधिकारियों के खिलाफ लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि होना अभी बाकी है। अंतिम स्थिति जांच और सक्षम प्राधिकारी के निष्कर्ष के बाद ही स्पष्ट होगी।
