जमशेदपुर/आदित्यपुर : औद्योगिक क्षेत्र में दम तोड़ता एशिया, उद्यमी संगठन उद्योग हित के बजाय सफेदपोशों की स्वार्थसिद्धि का लाइजनिंग मंच…” शीर्षक से प्रकाशित रिपोर्ट के बाद औद्योगिक, उपभोक्ता और श्रमिक जगत में बहस तेज हो गई है। रिपोर्ट में उठाए गए सवालों को लेकर उद्यमियों, बुद्धिजीवियों और उद्योग से जुड़े लोगों की प्रतिक्रियाएं सामने आने लगी हैं। कई लोगों ने माना कि औद्योगिक संगठनों की भूमिका, उनकी जवाबदेही और सामान्य उद्यमियों के प्रति उनकी प्राथमिकताओं पर अब खुली चर्चा जरूरी है।

इसे भी पढ़े : कभी सरकारी अधिकारियों पर प्रभाव रखने वाला एशिया अब क्यों मौन?
देश के एक बड़े कॉरपोरेट समूह से जुड़े एक उद्यमी ने भी रिपोर्ट पढ़ने के बाद प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि इस विषय को सामान्य उद्यमियों के हित में आगे ले जाने की जरूरत है। बताया जाता है कि वे पूर्व में आदित्यपुर ऑटो क्लस्टर की निदेशक मंडली/ट्रस्टी समूह से जुड़े रहे हैं। हालांकि, संगठनात्मक कार्यप्रणाली को लेकर मतभेद के बाद उन्होंने स्वयं को उससे अलग कर लिया। ऑटो क्लस्टर की कार्यप्रणाली और उससे जुड़े सवालों पर भी रिपोर्ट की अगली कड़ियों में विस्तार से चर्चा किए जाने की बात सामने आई है।
उद्योग जगत की ताकत कमजोर होने का आरोप……
अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत से जुड़े एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि “उद्योग जगत के सामर्थ्य को नष्ट कर दिया गया है।” उन्होंने एशिया और उसके नेतृत्व की कार्यप्रणाली को लेकर गंभीर सवाल उठाए। उनका कहना था कि उद्योग संगठनों की वास्तविक ताकत तभी कायम रह सकती है, जब उनकी प्राथमिकता आम उद्यमी, रोजगार और औद्योगिक विकास हो।
20 साल पुराना प्लॉट… आज भी कब्जे का इंतजार……
इस पूरे विवाद में आदित्यपुर की एक महिला उद्यमी का मामला सबसे बड़ा सवाल बनकर उभर रहा है। उपलब्ध दस्तावेजों और शिकायतों के अनुसार, तत्कालीन आयडा की ओर से करीब दो दशक पहले फेज-3 में महिला उद्यमी की कंपनी को लगभग 30 हजार वर्गफीट का औद्योगिक भूखंड आवंटित किया गया था. दावा है कि आवंटन के लगभग 20 वर्ष बाद भी उद्यमी को भूखंड का वास्तविक कब्जा नहीं मिल सका। महिला उद्यमी की ओर से उपलब्ध कराए गए दस्तावेजों और शिकायतों में भूखंड से जुड़े कई सवाल उठाए गए हैं।
शिकायत में कथित तौर पर दूसरे औद्योगिक प्रतिष्ठान की ओर से नाला निकाले जाने तथा भूखंड पर किसी अन्य प्रतिष्ठान के नाम से वृक्षारोपण किए जाने जैसे मुद्दे भी उठाए गए हैं।
अब सवाल यह है कि यदि भूखंड आवंटित था, तो दो दशक बाद भी वास्तविक कब्जा क्यों नहीं मिला? नाला किसकी अनुमति से निकला? वृक्षारोपण किसके नाम पर और किस आधार पर हुआ? संबंधित विभागों और औद्योगिक संगठन की भूमिका क्या रही?
और सबसे बड़ा सवाल—क्या यही वह औद्योगिक वातावरण था, जिसका सपना कभी स्वर्गीय विक्टर सिंह, स्वर्गीय प्रमोद सिंह और आर.के. सिन्हा जैसे उद्योग नेतृत्वकर्ताओं ने देखा था?
मदद की उम्मीद थी, मिला हतोत्साहन—महिला उद्यमी का आरोप……
महिला उद्यमी का आरोप है कि जिस औद्योगिक संगठन से उन्हें अपने उद्योग हित में सहयोग और समस्या के समाधान की उम्मीद थी, वहां उनकी समस्या को प्रभावी ढंग से उठाने के बजाय उन्हें हतोत्साहित किया गया. इस संबंध में लिखित पत्राचार उपलब्ध होने का दावा किया गया है। यदि ये दस्तावेज अपने मूल रूप में सही पाए जाते हैं, तो यह सवाल और गंभीर हो जाता है कि उद्योग संगठन की पहली जिम्मेदारी किसके प्रति है—सामान्य उद्यमी के प्रति या प्रभावशाली वर्ग के प्रति?
नवोदित उद्यमियों की आवाज भी उठी…….
एक अन्य एमएसई उद्यमी एम.एस. सिंह ने भी संगठन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि उद्योग हित और नवोदित उद्यमियों को प्रोत्साहित करने के मामलों में एशिया से जुड़े कुछ प्रतिनिधियों की भूमिका निराशाजनक रही है. उन्होंने जियाडा की बैठकों में संगठन के प्रतिनिधियों की कार्यशैली को लेकर भी आपत्ति जताई और स्वयं को इस प्रक्रिया का भुक्तभोगी बताया. एम.एस. सिंह ने कुछ प्रतिनिधियों की भूमिका पर गंभीर आरोप लगाते हुए उन्हें “पॉकेट संस्था” जैसी भूमिका निभाने वाला बताया है। हालांकि, इन आरोपों पर संबंधित पक्ष का आधिकारिक पक्ष भी महत्वपूर्ण होगा।
जियाडा से जुड़े सीए की भूमिका पर भी सवाल……
इसी क्रम में जियाडा से जुड़े एक चार्टर्ड अकाउंटेंट की भूमिका को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, संबंधित सीए को फिलहाल जियाडा की सेवाओं से अलग किया जा चुका है. आरोप है कि उनकी नियुक्ति में एशिया नेतृत्व की भूमिका रही थी। कुछ शिकायतकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि संबंधित व्यक्ति संगठन के प्रभावशाली लोगों के एजेंडे के अनुरूप काम करते थे। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है और संबंधित पक्ष का जवाब इस पूरे मामले में महत्वपूर्ण होगा।
स्ट्रीट लाइट से ऑनलाइन बीडिंग तक… सवालों की लंबी फेहरिस्त…….
औद्योगिक क्षेत्र में उठ रही चर्चाओं का दायरा केवल एक भूखंड या एक उद्यमी तक सीमित नहीं है. स्ट्रीट लाइट के नाम पर शुल्क वसूली, औद्योगिक प्लॉट के लिए ऑनलाइन बीडिंग, जियाडा की बैठकों में उद्योग संगठनों के प्रतिनिधियों की भूमिका, नवोदित उद्यमियों की समस्याएं और ऑटो क्लस्टर की कार्यप्रणाली जैसे मुद्दे भी चर्चा के केंद्र में हैं. इन तमाम सवालों के बीच अब उद्योग जगत में यह बहस तेज होती दिख रही है कि औद्योगिक संगठन आखिर किसके लिए हैं?
उद्योग का मंच या प्रभावशाली लोगों का गलियारा?…….
पूरे विवाद का मूल प्रश्न यही है. क्या उद्योग संगठनों की प्राथमिकता सामान्य उद्यमी की समस्या का समाधान, नए उद्योगों को बढ़ावा देना और औद्योगिक वातावरण को मजबूत करना होना चाहिए, या फिर संगठन का इस्तेमाल प्रभावशाली लोगों के हितों की पैरवी के लिए होना चाहिए?
महिला उद्यमी के दो दशक पुराने भूखंड से लेकर नवोदित उद्यमियों की शिकायतों तक, जियाडा की बैठकों से लेकर ऑटो क्लस्टर की कार्यप्रणाली तक और स्ट्रीट लाइट शुल्क से लेकर प्लॉट की ऑनलाइन बीडिंग तक—सवालों की फेहरिस्त लंबी है।
अब नजर इस बात पर है कि एशिया नेतृत्व इन आरोपों और सवालों पर क्या जवाब देता है. क्योंकि उद्योग संगठन केवल पद, प्रतिष्ठा और बैठकों का नाम नहीं होते। उनकी असली पहचान इस बात से तय होती है कि मुश्किल वक्त में वे कितने सामान्य उद्यमियों के साथ खड़े होते हैं. यह सवाल अब किसी एक व्यक्ति का नहीं, पूरे औद्योगिक तंत्र की विश्वसनीयता का बन चुका है।
