लोहे के ढेर में राज छिपे हैं, हिसाब-किताब के पन्ने खामोश हैं,
स्क्रैप पर किसका कब्जा है, इसके सवाल आज भी बेनकाब हैं।
सूद के शिकंजे से कारोबार तक, किसकी चलती है हुकूमत,
जांच की आंच पड़े तो शायद खुल जाए पूरी हकीकत।
जमशेदपुर/आदित्यपुर : स्क्रैप कारोबार में सरताज माने जाने वाले ज्ञान चंद उर्फ बबलू जायसवाल की गिरफ्तारी के बाद आदित्यपुर के कथित स्क्रैप नेटवर्क को लेकर कई गंभीर सवाल फिर सामने खड़े हो गए हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि स्क्रैप की नकद खरीद-बिक्री, जीएसटी भुगतान और कारोबार से जुड़े दस्तावेजों की जांच आखिर कब होगी? अगर निष्पक्ष तरीके से जांच शुरू होती है तो क्या इस कारोबार की परतों के पीछे छिपी कई दूसरी कहानियां भी सामने आएंगी?

मामला सिर्फ स्क्रैप खरीद-बिक्री तक सीमित नहीं बताया जा रहा। सवाल उस नामी स्टील कंपनी को लेकर भी उठ रहे हैं, जहां इन दिनों संबंधित कारोबारी के माध्यम से स्क्रैप की बिक्री और फ्लैट प्रोडक्ट से जुड़ा कारोबार होने की चर्चा है। यह वही कंपनी है जो कार्बन उत्सर्जन कम करने, पर्यावरण संरक्षण और कॉरपोरेट एथिक्स को अपनी कार्यसंस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा बताती है। ऐसे में यदि किसी बाहरी कारोबारी के खिलाफ गंभीर आरोपों की जांच होती है, तो कंपनी की खरीद प्रक्रिया और सप्लायर चयन भी स्वाभाविक रूप से जांच के दायरे में आने वाले सवाल बन जाते हैं।
स्क्रैप पर कब्जे का खेल या कारोबार की मजबूरी?…….
औद्योगिक सूत्रों के हवाले से यह आरोप सामने आ रहा है कि आदित्यपुर के कई छोटे मशीनिंग और ऑटो कंपोनेंट कारखानों को कथित तौर पर सूद पर पैसा उपलब्ध कराया गया और बदले में उनसे अपना स्क्रैप एक निश्चित कारोबारी नेटवर्क को देने का दबाव बनाया गया। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि होना अभी बाकी है. यह भी आरोप है कि जो कारखाने इस कथित व्यवस्था का हिस्सा नहीं बनते, उनके सामने अलग-अलग तरह की परेशानियां खड़ी की जाती हैं। पत्थरबाजी, चोरी अथवा वाहनों को रोकने जैसे आरोपों की भी चर्चा औद्योगिक गलियारों में है। चावला मोड़ पर कथित रूप से लोगों की तैनाती और दूसरे स्क्रैप खरीदारों के वाहनों को रोकने तक के आरोप लगाए जा रहे हैं। इन आरोपों की निष्पक्ष जांच जरूरी है, ताकि सच और अफवाह के बीच की रेखा साफ हो सके।
सूद से स्क्रैप तक—किसका कितना दबदबा?…….
औद्योगिक संगठनों में प्रभाव को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि एशिया और लघु उद्योग भारती जैसे संगठनों में प्रभाव का इस्तेमाल कर छोटे उद्यमियों पर दबदबा कायम किया गया। इसी कड़ी में ज्ञान चंद जायसवाल के पूर्व में संगठनात्मक पद पर रहने और बाद में हटाए जाने को भी स्क्रैप कारोबार की प्रतिस्पर्धा से जोड़कर देखा जा रहा है. यह भी दावा किया जा रहा है कि स्टील कंपनी में ज्ञान चंद जायसवाल के ब्लैकलिस्ट होने की प्रक्रिया के पीछे कारोबारी प्रतिद्वंद्विता का कोण हो सकता है। किसके दबाव में क्या हुआ, किसने शिकायत की और ब्लैकलिस्टिंग का वास्तविक आधार क्या था—इन सवालों का जवाब संबंधित दस्तावेज और जांच ही दे सकती है।
स्क्रैप की मोनोपली पर बड़ा सवाल……
सबसे गंभीर सवाल उस स्टील कंपनी की खरीद नीति को लेकर है। दावा किया जा रहा है कि जमशेदपुर में दूसरे स्क्रैप कारोबारियों के लिए कंपनी को स्क्रैप बेचने का रास्ता बेहद सीमित या बंद है और एक खास कारोबारी कंपनी को इस कारोबार में प्रमुखता मिली हुई है।
यदि ऐसा है तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि स्क्रैप खरीद की यह व्यवस्था किन शर्तों पर बनी, किस प्रक्रिया से सप्लायर का चयन हुआ और क्या अन्य कारोबारियों को समान अवसर मिला?
क्या किसी कारोबारी को स्क्रैप खरीद का इतना बड़ा नेटवर्क मिलना महज कारोबारी प्रक्रिया है या इसके पीछे किसी प्रकार का प्रभाव अथवा लॉबिंग काम कर रही थी—यह भी जांच का विषय हो सकता है।
कैश से कागज तक—जीएसटी की कुंडली कौन खोलेगा?…….
स्क्रैप कारोबार में नकद लेन-देन, बिलिंग, जीएसटी भुगतान, स्टॉक और माल की वास्तविक आवाजाही जैसे सवालों की जांच यदि जीएसटी विभाग करता है तो तस्वीर कहीं ज्यादा साफ हो सकती है। स्क्रैप कहां से आया, किस कीमत पर खरीदा गया, भुगतान किस माध्यम से हुआ, किसके नाम बिल बना और आखिर माल कहां खपा—इन सवालों की पूरी कड़ी जांच का विषय है।
जांच का दायरा यदि बढ़ता है तो केवल कारोबारी ही नहीं, बल्कि खरीद प्रक्रिया से जुड़े दस्तावेज और संबंधित संस्थानों की भूमिका भी सामने आ सकती है। इसलिए यह मामला सिर्फ एक स्क्रैप कारोबारी की गिरफ्तारी तक सीमित नहीं दिखता, बल्कि पूरे स्क्रैप नेटवर्क की पारदर्शिता पर सवाल खड़े करता है।
अब सवालों के घेरे में कौन?
क्या आदित्यपुर के स्क्रैप कारोबार की पूरी खरीद-बिक्री की जांच होगी?
क्या नकद लेन-देन और जीएसटी भुगतान का मिलान कराया जाएगा?
क्या छोटे कारखानों से स्क्रैप खरीदने की व्यवस्था की निष्पक्ष जांच होगी?
क्या चावला मोड़ से जुड़े आरोपों की पड़ताल होगी?
और सबसे बड़ा सवाल—क्या स्टील कंपनी की स्क्रैप खरीद नीति और सप्लायर चयन की प्रक्रिया भी सार्वजनिक जांच के दायरे में आएगी?
