मुरी/सिल्ली : राजधानी से सटे मुरी-सिल्ली प्रखंड के सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी विकास की किरण नहीं पहुँच पाई है। ताज़ा मामला गोडा़डीह पंचायत के खेरबेडा का है, जहाँ मूलभूत सुविधाओं के अभाव में ग्रामीण न केवल दूषित पानी पीने को मजबूर हैं, बल्कि आजीविका के लिए अवैध शराब के निर्माण जैसे जोखिम भरे कार्यों में संलिप्त हैं।

















पुलिया के नीचे धधकती अवैध भत्तियाँ
सिल्ली के खेरबेडा पुलिया के नीचे इन दिनों अवैध रूप से देशी शराब (दारू) बनाने का काम धड़ल्ले से चल रहा है। जब इस संबंध में ग्रामीणों से बात की गई, तो उनका जवाब व्यवस्था पर कई सवाल खड़े करता है। ग्रामीणों का कहना है कि वे बड़े स्तर पर नहीं, बल्कि अपनी आजीविका चलाने के लिए थोड़ा-बहुत शराब चुआते हैं।
आजीविका का संकट और प्रशासनिक चुप्पी
क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि यहाँ वन और कृषि के अलावा आय का कोई दूसरा साधन नहीं है। खेती भी पूरी तरह मानसून पर निर्भर है। ऐसे में पेट भरने की मजबूरी ग्रामीणों को इस अवैध धंधे की ओर धकेल रही है। चौंकाने वाली बात यह है कि स्थानीय प्रशासन भी अक्सर इन गतिविधियों को ‘ओवरलुक’ कर देता है। जानकारों का मानना है कि पुलिस और प्रशासन भी जानते हैं कि यदि इसे सख्ती से बंद कराया गया, तो इन परिवारों के सामने भूखमरी की स्थिति पैदा हो जाएगी।
आज़ादी के दशकों बाद भी ‘डाड़ी’ का सहारा
एक तरफ जहाँ सरकार हर घर नल से जल पहुँचाने का दावा कर रही है, वहीं गोडा़डीह के इन क्षेत्रों में ग्रामीण आज भी सालों पुराने ‘डाड़ी’ (चुआं) का दूषित पानी पीने को विवश हैं। स्वच्छ पेयजल की अनुपलब्धता के कारण यहाँ बीमारियों का खतरा हमेशा बना रहता है।
मुख्य चुनौतियाँ:
- विकल्पहीनता: कृषि के अलावा रोजगार के किसी अन्य साधन का न होना।
- पेयजल संकट: सरकारी योजनाओं का सुदूर क्षेत्रों तक न पहुँचना।
- कानून बनाम मजबूरी: सरकारी प्रतिबंध के बावजूद आजीविका के लिए अवैध कार्यों का सहारा।
निष्कर्ष:
गोडा़डीह की यह तस्वीर झारखंड के सुदूर ग्रामीण इलाकों की उस कड़वी सच्चाई को बयां करती है, जहाँ कानून और पेट की भूख के बीच का संघर्ष जारी है। क्या प्रशासन यहाँ बुनियादी सुविधाएँ और रोजगार के अवसर पहुँचाएगा, या ग्रामीण इसी तरह अवैध धंधों और दूषित पानी के भरोसे जीने को मजबूर रहेंगे?
रिपोर्ट: (रिंकी कुमारी / लोकतंत्र सवेरा )
