धनबाद : आधुनिक दौर में जहाँ हम डिजिटल इंडिया और अत्याधुनिक स्वास्थ्य सेवाओं का दावा करते हैं, वहीं धनबाद के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल SNMMCH (शहीद निर्मल महतो मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल) से आई एक तस्वीर सिस्टम को शर्मसार करने वाली है। यहाँ इलाज शुरू होने से पहले ही नवजातों की जिंदगी दांव पर लग जाती है।


















मां की गोद में ‘मौत का सफर’
अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में नवजातों के लिए पीडियाट्रिक (शिशु रोग) सुविधाओं का अभाव है। आलम यह है कि अगर कोई नवजात गंभीर स्थिति में इमरजेंसी पहुँचता है, तो उसे इलाज के लिए करीब 500 मीटर दूर दूसरे भवन में स्थित पीडियाट्रिक विभाग ले जाना पड़ता है।
इस बीच जो दृश्य सामने आता है, वह किसी का भी कलेजा चीर दे— बदहवास मां की गोद में तड़पता हुआ बच्चा और साथ चल रहे स्वास्थ्य कर्मी के हाथ में ऑक्सीजन सिलिंडर।
व्यवस्था पर खड़े होते गंभीर सवाल
- संक्रमण का खतरा : खुले आसमान के नीचे नवजात को एक बिल्डिंग से दूसरी बिल्डिंग ले जाने के दौरान इंफेक्शन का खतरा बना रहता है।
- समय की बर्बादी : गंभीर मामलों में एक-एक सेकंड कीमती होता है, ऐसे में 500 मीटर का यह ‘जोखिम भरा सफर’ जानलेवा साबित हो सकता है।
- संसाधनों की कमी : क्या इतने बड़े मेडिकल कॉलेज में इमरजेंसी के भीतर बुनियादी स्टेबलाइजेशन यूनिट नहीं होनी चाहिए?
ग्राउंड रिपोर्ट का निष्कर्ष
यह विडंबना ही है कि अस्पताल प्रशासन और सरकार करोड़ों के बजट का दावा करती है, लेकिन एक मासूम को वार्ड तक पहुँचाने के लिए न तो उचित स्ट्रेचर की व्यवस्था दिखती है और न ही विभागों के बीच समन्वय। हर कदम पर मां का डर और अनिश्चितता यह बताने के लिए काफी है कि झारखंड की स्वास्थ्य व्यवस्था फिलहाल खुद ‘इमरजेंसी’ में है।
