लोकतंत्र सवेरा | झारखंड की राजनीति हमेशा से राष्ट्रीय राजनीति के पारंपरिक ढांचे से अलग रही है। यहां चुनाव केवल विकास योजनाओं, सड़क, बिजली और केंद्र सरकार की नीतियों पर नहीं जीते जाते, बल्कि राजनीति की असली धुरी जल-जंगल-जमीन, आदिवासी अस्मिता, स्थानीय पहचान और क्षेत्रीय स्वाभिमान जैसे भावनात्मक मुद्दे रहे हैं। यही कारण है कि अलग झारखंड राज्य के गठन का राजनीतिक श्रेय लेने वाली भारतीय जनता पार्टी भी राज्य में लंबे समय तक स्थायी राजनीतिक वर्चस्व स्थापित नहीं कर सकी।



15 नवंबर 2000 को तत्कालीन प्रधानमंत्री Atal Bihari Vajpayee के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने बिहार से अलग कर झारखंड राज्य का गठन किया। उस समय माना जा रहा था कि राज्य निर्माण का सबसे बड़ा राजनीतिक लाभ भाजपा को मिलेगा और आने वाले वर्षों में पार्टी यहां निर्विवाद शक्ति बन जाएगी। लेकिन झारखंड की सामाजिक संरचना और क्षेत्रीय राजनीति ने धीरे-धीरे यह स्पष्ट कर दिया कि राज्य की सत्ता केवल राष्ट्रीय मुद्दों के सहारे हासिल करना आसान नहीं होगा।
राज्य गठन के बाद भाजपा नेता Babulal Marandi झारखंड के पहले मुख्यमंत्री बने। भाजपा के लिए यह राजनीतिक रूप से मजबूत शुरुआत थी, लेकिन शुरुआती वर्षों में ही पार्टी को यह एहसास हो गया कि झारखंड की राजनीति का केंद्र आदिवासी समाज और उसकी भावनात्मक पहचान है। इसी सामाजिक आधार पर Shibu Soren और Jharkhand Mukti Morcha ने ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में अपनी मजबूत पकड़ बनाए रखी।
भाजपा का प्रभाव मुख्य रूप से शहरी क्षेत्रों, व्यापारिक वर्ग और गैर-आदिवासी मतदाताओं में दिखाई देता रहा, जबकि आदिवासी बहुल इलाकों में झामुमो लगातार अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करता गया। इसी दौर में झारखंड की राजनीति दो अलग धाराओं में बंटती नजर आई—एक ओर भाजपा राष्ट्रीय नेतृत्व और संगठनात्मक ताकत के सहारे आगे बढ़ रही थी, दूसरी ओर झामुमो खुद को “झारखंडी अस्मिता” की असली आवाज के रूप में स्थापित कर रहा था।
2005 के विधानसभा चुनाव में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर जरूर उभरी, लेकिन स्पष्ट बहुमत से दूर रह गई। सरकार बनी, मगर स्थिरता नहीं आ सकी। इसके बाद झारखंड लंबे समय तक राजनीतिक अस्थिरता का केंद्र बना रहा। निर्दलीय विधायक सत्ता के समीकरण तय करने लगे, गठबंधन बदलते रहे और मुख्यमंत्री बदलने का सिलसिला लगातार चलता रहा। इसी दौर में राज्य की राजनीति में “सत्ता प्रबंधन” और जोड़-तोड़ की संस्कृति मजबूत हुई, जहां विचारधारा से ज्यादा संख्या का गणित महत्वपूर्ण बन गया।
2009 का चुनाव भी त्रिशंकु परिणाम लेकर आया। सत्ता तक पहुंचने के लिए भाजपा और झामुमो ने साथ मिलकर सरकार बनाई। 28-28 महीने मुख्यमंत्री पद साझा करने के फार्मूले पर बनी यह सरकार राजनीतिक अविश्वास का प्रतीक बन गई। दोनों दलों के बीच लगातार मतभेद बढ़ते रहे और अंततः सरकार गिर गई। इस घटनाक्रम ने जनता के बीच यह धारणा मजबूत कर दी कि झारखंड की राजनीति में सिद्धांत से अधिक सत्ता संतुलन हावी है।
भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती हमेशा आदिवासी वोट बैंक रही। पार्टी ने समय-समय पर Arjun Munda और बाबूलाल मरांडी जैसे आदिवासी नेताओं को आगे बढ़ाकर संतुलन बनाने की कोशिश की, लेकिन विपक्ष लगातार यह आरोप लगाता रहा कि भाजपा स्थानीय मुद्दों और आदिवासी संवेदनाओं को पूरी तरह समझने में सफल नहीं रही। इसके उलट झामुमो ने जल-जंगल-जमीन और क्षेत्रीय अधिकारों को अपनी राजनीति का केंद्रीय विषय बनाए रखा।
2014 में देशभर में चली मोदी लहर का असर झारखंड में भी दिखाई दिया। भाजपा और उसके सहयोगियों ने बहुमत हासिल किया और Raghubar Das राज्य के मुख्यमंत्री बने। यह झारखंड की राजनीति का ऐतिहासिक मोड़ था, क्योंकि पहली बार राज्य को अपेक्षाकृत स्थिर सरकार मिली और पहली बार कोई गैर-आदिवासी नेता मुख्यमंत्री बना।
रघुवर दास सरकार ने विकास, सड़क, निवेश और प्रशासनिक स्थिरता को अपनी प्राथमिकता बताया, लेकिन इसी कार्यकाल में कई ऐसे फैसले हुए, जिन्होंने भाजपा की राजनीतिक मुश्किलें बढ़ा दीं। विशेष रूप से CNT-SPT एक्ट संशोधन, भूमि अधिग्रहण, स्थानीय नीति और विस्थापन से जुड़े मुद्दों पर आदिवासी संगठनों और विपक्ष ने सरकार के खिलाफ बड़ा आंदोलन खड़ा किया। इन विवादों ने आदिवासी समाज के बीच भाजपा की छवि को नुकसान पहुंचाया।
इसी दौरान भाजपा के भीतर भी असंतोष खुलकर सामने आने लगा। वरिष्ठ नेता Saryu Roy ने रघुवर सरकार के खिलाफ खुला मोर्चा खोल दिया और 2019 के चुनाव में जमशेदपुर पूर्वी सीट से तत्कालीन मुख्यमंत्री रघुवर दास को हराकर राज्य की राजनीति में बड़ा संदेश दिया। इसे भाजपा के अंदर नेतृत्व संघर्ष और संगठनात्मक असंतोष के प्रतीक के रूप में देखा गया।
2019 का विधानसभा चुनाव भाजपा के लिए बड़ा राजनीतिक झटका साबित हुआ। केंद्र में मजबूत मोदी सरकार होने के बावजूद पार्टी झारखंड की सत्ता गंवा बैठी। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार CNT-SPT विवाद, स्थानीय बनाम बाहरी की राजनीति, बेरोजगारी, विस्थापन और आदिवासी असंतोष जैसे मुद्दों ने भाजपा को नुकसान पहुंचाया। दूसरी ओर झामुमो, कांग्रेस और राजद का गठबंधन पूरी मजबूती से मैदान में उतरा और चुनाव को “झारखंडी पहचान” बनाम “बाहरी राजनीति” की दिशा देने में सफल रहा।
झारखंड की राजनीति का सबसे बड़ा विरोधाभास यही माना जाता है कि भाजपा लोकसभा चुनावों में लगातार मजबूत प्रदर्शन करती रही है, लेकिन विधानसभा चुनावों में वही बढ़त कायम नहीं रख पाती। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि लोकसभा चुनावों में प्रधानमंत्री Narendra Modi का प्रभाव, राष्ट्रीय सुरक्षा, हिंदुत्व और केंद्र सरकार की योजनाएं निर्णायक भूमिका निभाती हैं, जबकि विधानसभा चुनावों में स्थानीय नेतृत्व, रोजगार, जमीन विवाद, विस्थापन और आदिवासी पहचान जैसे मुद्दे ज्यादा प्रभावशाली हो जाते हैं।
यही वजह है कि झारखंड में चुनावी राजनीति का केंद्र दिल्ली नहीं, बल्कि गांव, जमीन और स्थानीय अधिकारों का सवाल बन जाता है। भाजपा आज भी राज्य में मजबूत संगठन और प्रभावशाली कैडर वाली पार्टी मानी जाती है, लेकिन स्थायी राजनीतिक बढ़त के लिए उसे केवल राष्ट्रीय विमर्श नहीं, बल्कि झारखंड की क्षेत्रीय भावनाओं और आदिवासी विश्वास को भी उतनी ही गंभीरता से समझना होगा।
झारखंड की राजनीति आज भी उसी मूल सवाल के इर्द-गिर्द घूमती दिखाई देती है— “जल, जंगल, जमीन और रोजगार पर असली अधिकार किसका होगा?”



