सौरभ कुमार, जादूगोड़ा
लोकतंत्र सवेरा : पूर्वी सिंहभूम की धरती प्राकृतिक सुंदरता के साथ-साथ रहस्यमयी लोककथाओं और आध्यात्मिक इतिहास को भी अपने भीतर समेटे हुए है। घने जंगलों, पहाड़ियों और आदिवासी संस्कृति के बीच जादूगोड़ा-हाता मुख्य मार्ग पर स्थित कपारगादी का माँ जगत जननी रंकिणी मंदिर आज भी हजारों श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है।



पहाड़ियों के बीच बसे इस मंदिर में पहुंचते ही श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक शांति और प्रकृति के अद्भुत सौंदर्य का अनुभव होता है। सुबह की पहली किरण जब मंदिर के शिखर और आसपास की पहाड़ियों पर पड़ती है, तो पूरा वातावरण दिव्यता से भर उठता है। मंदिर परिसर में गूंजती घंटियों की ध्वनि, ठंडी हवाएं और पक्षियों की मधुर आवाजें यहां आने वाले लोगों को मानसिक सुकून प्रदान करती हैं।
माँ रंकिणी मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां किसी भव्य प्रतिमा की स्थापना नहीं की गई है। मंदिर में प्राकृतिक शिला को ही माँ के पाषाण स्वरूप के रूप में पूजा जाता है। चांदी की आंखों से सुसज्जित यह स्वरूप श्रद्धालुओं की गहरी आस्था का केंद्र बना हुआ है। स्थानीय लोगों का विश्वास है कि मां के दरबार से कोई भी भक्त खाली हाथ वापस नहीं लौटता।
मंगलवार और शनिवार को मंदिर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है। महिलाएं लाल चुनरी और पूजा सामग्री के साथ मां के दर्शन के लिए पहुंचती हैं, जबकि युवा और बुजुर्ग श्रद्धा से सिर झुकाकर अपनी मनोकामनाएं व्यक्त करते हैं। “जय मां रंकिणी” के जयकारों से पूरा मंदिर परिसर भक्तिमय हो उठता है।
स्वप्न में मिले थे मां के दर्शन……
मंदिर से जुड़ी लोककथाएं आज भी लोगों के बीच रहस्य और श्रद्धा का विषय बनी हुई हैं। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार वर्ष 1947 से 1950 के बीच कपारगादी निवासी दिनबंधु सिंह को मां ने स्वप्न में दर्शन देकर एक विशेष पत्थर को अपने स्वरूप के रूप में स्थापित करने और पूजा-अर्चना शुरू करने का आदेश दिया था। इसके बाद यहां नियमित आराधना शुरू हुई और धीरे-धीरे यह स्थान विशाल आस्था केंद्र के रूप में विकसित हो गया।
स्थानीय लोगों का मानना है कि मां रंकिणी तीन बहनें थीं और उनके प्रमुख मंदिर कपारगादी, गालूडीह और घाटशिला में स्थापित हैं। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि मां तीनों स्थानों पर अलग-अलग स्वरूप में विराजमान होकर अपने भक्तों की रक्षा करती हैं।
रहस्यमयी कथाओं से जुड़ा है मंदिर का इतिहास……
माँ रंकिणी मंदिर का इतिहास कई रहस्यमयी जनश्रुतियों से भी जुड़ा हुआ है। स्थानीय कथाओं के अनुसार प्राचीन समय में यहां नरबलि की प्रथा प्रचलित थी, जिसे अंग्रेजों ने वर्ष 1865 के आसपास बंद कराया था। हालांकि इन बातों का कोई आधिकारिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है, लेकिन ग्रामीण समाज में ये कथाएं आज भी प्रचलित हैं।
एक अन्य लोककथा के अनुसार, जंगल में एक आदिवासी व्यक्ति ने आभूषणों से सजी एक छोटी बालिका को देखा था, जो अचानक रहस्यमय ढंग से गायब हो गई। उसी रात देवी ने उसे सपने में दर्शन देकर मंदिर निर्माण का आदेश दिया। बुजुर्ग आज भी इन कथाओं को बड़े विश्वास के साथ सुनाते हैं।
प्राकृतिक सौंदर्य भी करता है आकर्षित……
मंदिर परिसर के सामने स्थित पहाड़ी पर बजरंगबली की विशाल प्रतिमा श्रद्धालुओं और पर्यटकों को विशेष रूप से आकर्षित करती है। पहाड़ी की ऊंचाई से दिखाई देने वाली हरियाली, दूर-दूर तक फैले जंगल और पहाड़ों की श्रृंखलाएं किसी प्राकृतिक पर्यटन स्थल जैसा मनोरम दृश्य प्रस्तुत करती हैं। बरसात के दिनों में बादलों से ढकी पहाड़ियां और ठंडी हवाएं यहां के वातावरण को और भी मनमोहक बना देती हैं।
वर्षों से निभाई जा रही विशेष परंपरा……
मंदिर में वर्षों से एक विशेष परंपरा भी निभाई जा रही है। श्रद्धालु अपनी मनोकामना पूरी होने की आशा में लाल कपड़े में सुपाड़ी, नारियल और अक्षत बांधकर मंदिर परिसर में टांगते हैं। मान्यता है कि मनोकामना पूरी होने पर वह बंधन अपने आप खुल जाता है।
मंदिर में पूजा-अर्चना की जिम्मेदारी परंपरागत रूप से सहाड़ा गांव के भूमिज समाज के पुजारियों द्वारा निभाई जाती है। वर्तमान में मुख्य पुजारी अनिल सिंह वर्षों से मां की सेवा में समर्पित हैं। बताया जाता है कि वर्तमान मंदिर का निर्माण लगभग वर्ष 1950 के आसपास हुआ था, जबकि मंदिर ट्रस्ट का गठन 1954 में किया गया।
आज कपारगादी स्थित माँ रंकिणी मंदिर झारखंड के साथ-साथ ओडिशा और पश्चिम बंगाल के हजारों श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र बन चुका है। श्रद्धालुओं का कहना है कि मां के दरबार में पहुंचते ही उन्हें मानसिक शांति, सकारात्मक ऊर्जा और आत्मिक सुकून का अनुभव होता है। कपारगादी की वादियों में बसे इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि यहां केवल पूजा नहीं, बल्कि प्रकृति, विश्वास और रहस्य का अद्भुत संगम देखने को मिलता है।



