लोकतंत्र सवेरा : पांच साल झारखंड के मुख्यमंत्री रहें रघुवर दास को 2019 के चुनाव में सरयू राय ने उन्ही के विधानसभा में उन्हें निर्दलीय उतरकर हरा दिया. उसके बाद समय का पहिया घुमा और पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास को ओडिशा का राज्यपाल बना दिया गया है. राज्यपाल बनने के बाद यह कहा जा रहा है कि वे चुनावी राजनीति से अलग हो गये है. ऐसे में यह चर्चा आम है कि रघुवर दास नहीं तो फिर कौन भाजपा का प्रत्याशी होगा।
रघुवर दास की जगह भाजपा के टिकट के लिए कई लोग दावेदार सामने आये है. इसमें भाजपा नेता दिनेश कुमार का नाम चर्चा में है. दिनेश कुमार पूर्व मुख्यमंत्री व ओडिशा के राज्यपाल रघुवर दास के परिवार से आते हैं. वहीं दूसरी तरफ उनकी पार्टी में बहुत अच्छी खासी पकड़ है. वे भाजपा जमशेदपुर महानगर के जिला अध्यक्ष भी रह चुके हैं. साथ ही साथ दिनेश कुमार विपक्ष के नेता प्रतिपक्ष अमर बाउरी के काफी करीबी और स्कूल के मित्र भी है।
क्या राजनीति और सामाजिक तौर पर सक्रिय चल रहे शिव शंकर सिंह पर भाजपा लगाएगी दांव…..??
राजनीति और सामाजिक तौर पर सक्रिय चल रहे सामाजिक कार्यकर्ता और भाजपा नेता शिवशंकर सिंह का नाम भी काफी तेजी से सामने आ रहा है. जो लगातार हर समाज और हर कार्यक्रमों में सक्रिय है, ऐसे में वे भी चुनाव लड़ेंगे और इस बार जमशेदपुर पूर्वी के प्रत्याशी भी होंगे, यह तय माना जा रहा है. शिवशंकर सिंह को सामाजिक कार्यकर्ता के रुप में अपनी एक अलग पहचान बना चुके हैं. और कई चुनावों में नेताओं के लिए तन, मन और धन से काम करते और कराते रहे है. मृदुभाषी शिवशंकर सिंह अपने सामाजिक कार्यों के लिए समाज के हर वर्ग में जगह बना चुके है. शिवशंकर सिंह को सर्वदलीय कहा जाता है क्योंकि उनकी स्वीकार्यता हर समाज और हर पार्टी में है. ऐसे में वे बेहतर कैंडिडेट साबित हो सकते है. ऐसे में वे इस बार खुद चुनावी मैदान में आने की सोच चुके है।
क्या अमरप्रीत सिंह काले को 25 सालों से पार्टी में जुड़ाव और पूर्व केंद्रीय मंत्री अर्जुन मुंडा के करीबी होने का मिलेगा लाभ या फिर निर्दलीय होंगे मैदान में ….??
कई सालों से भाजपा में सक्रिय रहें और अर्जुन मुंडा के बेहद करीबी माने जाने वाले अमरप्रीत सिंह काले भी इस बार चुनाव मैदान में हैं. 2019 के विधानसभा चुनाव में निर्दलीय विधायक सरयू राय का साथ देने के चलते उन्हें भाजपा ने पार्टी से निस्काषित कर दिया था. उम्मीद जताया जा रहा है कि वे खुद निर्दलीय चुनाव लड़ सकते है. अमरप्रीत सिंह काले लगभग 25 साल से पूर्वी विधानसभा में मेहनत कर रहे है. और यह कहा जाता है कि सरयू राय की जीत में भी उनका ही हाथ था. यहीं कारण है कि भाजपा ने उनको निष्कासित किया था. हालांकि, वे भाजपा के कार्यक्रम खुद के बल पर करते रहे है और पार्टी के निष्ठावान कार्यकर्ता निष्कासन के बाद भी बने रहे।
निर्दलीय विधायक सरयू राय कर सकते है खेल खराब….
2019 में सिटिंग मुख्यमंत्री रघुवर दास को उन्ही के विधानसभा क्षेत्र में पटखनी देने वाले सरयू राय भी किसी से कम नहीं हैं. यही कारण है कि उन्हें झारखंड राजनीति का चाणक्य कहा जाता है. और इन दिनों बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से नजदीकी और थर्ड फ्रंट की चर्चा ने सबकी बैचनी को बड़ा दिया. अगर सरयू राय अपनी पार्टी का जदयू में विलय करते हैं और साथ मिलकर चुनाव लड़ते है तो यह भाजपा के आलाकमान के लिए बहुत बड़ा सर दर्द साबित होगा. क्योंकि केंद्र में एनडीए की घटक दल है. जदयू अगर ऐसा होता है. सरयू राय पार्टी में अपना बात मजबूती से रखेंगे या पार्टी के बात को स्वीकार करेगें जो पार्टी फैसला लेगी उस बात पर सरयू राय कायम रहेंगे. यह देखना काफी दिलचस्प होगा।
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