“कुछ ज़ख्म वक्त भी नहीं भर पाता, कुछ चीखें हवा में हमेशा गूंजती रहती हैं… जब घर का इकलौता चिराग बुझ जाता है, तो सिर्फ एक इंसान नहीं, पूरा परिवार उम्रभर के अंधेरे में जीने को मजबूर हो जाता है…”
लोकतंत्र सवेरा/जमशेदपुर : खाकी की चूक और चाकू की धार के बीच जिंदगी की जंग हार गया हिमांशु सिंह। कहते हैं कि जब वक्त पर मदद मिल जाए तो कई जिंदगियां बच जाती हैं, लेकिन इस दर्दनाक घटना में न समय पर मिली सुरक्षा काम आई, न इलाज और न ही दुआएं। आखिरकार एक परिवार का इकलौता बेटा हमेशा के लिए खामोश हो गया।

हिमांशु सिंह की मौत ने पूरे शहर को झकझोर कर रख दिया है। जिस घर में कुछ समय पहले तक खुशियां गूंज रही थीं, वहां अब मातम पसरा है। मां का कलेजे का टुकड़ा हमेशा के लिए बिछड़ गया, पिता के बुढ़ापे का सहारा छिन गया और नई-नवेली पत्नी की मांग का सिंदूर उजड़ गया। परिवार के आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे हैं। हर आने-जाने वाले की आंखें नम हैं और हर जुबान पर सिर्फ एक ही सवाल है—अगर समय रहते हालात संभाले जाते, तो क्या हिमांशु आज जिंदा होता?
घटना ने कानून-व्यवस्था और पुलिस की कार्यशैली पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। लोगों का कहना है कि यदि समय पर प्रभावी कार्रवाई होती और हालात पर तुरंत नियंत्रण पाया जाता, तो शायद एक परिवार उजड़ने से बच सकता था। इस दर्दनाक हादसे ने पूरे शहर को सोचने पर मजबूर कर दिया है कि आखिर आम नागरिक की सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी है।
हिमांशु सिंह अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनकी मौत अपने पीछे कई ऐसे सवाल छोड़ गई है, जिनका जवाब हर कोई तलाश रहा है। एक मां की सूनी आंखें, पिता की टूटी उम्मीदें और पत्नी की बिखरी जिंदगी इस हादसे की सबसे दर्दनाक तस्वीर बन चुकी हैं।
यह सिर्फ एक युवक की मौत नहीं, बल्कि एक पूरे परिवार के सपनों का अंत है। इस घटना ने यह एहसास करा दिया कि जब सुरक्षा व्यवस्था चूक जाती है, तो उसका सबसे बड़ा खामियाजा किसी बेगुनाह परिवार को अपनी पूरी जिंदगी रो-रोकर चुकाना पड़ता है।

