लेखक सुभाष शाह।।।

जनता जमीन, नेला उसीकी उपज ।
जस जमीन, तस, खेती |
संस्कृति पर्यावरण और जलवायु समान। भांति-भांति जलवायु, भांति-भांति फसल । भांति-भांति संस्कृति , भांति भांति नेता।
जनता ही दर्पण में नेता , अपवाद संभव है |
अपवाद कोसता-प्रकृति संस्कृति और नेता को , संस्कृति मजाक उड़ाती अपवाद का।
अपवाद को जनवाद बनाना है ,
तो मिटा दो संस्कृति, चाहे जितना भी महान हो |
राजनीति मिटा सकते अर्थनीति पलटकर पर संस्कृति मिटा नहीं सकते अर्थनीति और राजनीति पलटकर |
संस्कृति वैसे मिटाते जैसे नहान के बाद मैल को रगड़कर |
जनता की भावनाओं की बहती धार जनभावनाओं की बहतीधार की दोशा-संस्कृति, कुसंस्कृती | कुसंस्कृति को संस्कृति की दीशा मोड़ देता नेता।कुसंस्कृति की दीशा में बहता – स्वार्थों _ कचड़ा !
बहती जन माव को विषेला बनाता |
लेबल लगता गंगा-जल और अमृत की।
सुआर भैंस-वाह! वाहा-कीचड चारों ओर
आंख नाक बंदकरें- सज्जन ।
खोलो आंख खोलो- कमल खीला है।
