सरायकेला-खरसावां/पश्चिमी सिंहभूम : झारखण्ड सरकार के वन एवं पर्यावरण विभाग द्वारा अधिसूचना संख्या 03/वनभूमि/47/2009-3483/व०प०, दिनांक 17 सितंबर 2010 के माध्यम से सरायकेला-खरसावां एवं पश्चिमी सिंहभूम जिलों में चांडिल डैम एवं ईचा डैम के निर्माण से डूबी भूमि को आरक्षित वन घोषित किए जाने का मामला एक बार फिर चर्चा में आ गया है।



जानकारी के अनुसार उक्त अधिसूचना चांडिल डैम क्षेत्र की कुल 46,477.43 एकड़ तथा ईचा डैम क्षेत्र की 25,212.090 एकड़ भूमि पर लागू की गई है। यह वही भूमि बताई जा रही है, जिस पर डैम निर्माण से पूर्व हजारों परिवार पीढ़ियों से निर्भर थे और जिन्हें विस्थापन का सामना करना पड़ा था।
डैम विस्थापित परिवारों का कहना है कि जिस भूमि से उन्हें “विकास परियोजना” के नाम पर हटाया गया, आज उसी भूमि को वन क्षेत्र घोषित कर दिए जाने से वे अपने अधिकारों से वंचित हो गए हैं। विस्थापितों का आरोप है कि इस निर्णय के बाद कई स्थानों पर उन्हें वन अतिक्रमणकारी के रूप में देखा जा रहा है, जिससे सामाजिक एवं प्रशासनिक स्तर पर समस्याएँ उत्पन्न हो रही हैं।
इस पूरे मामले को लेकर जनप्रतिनिधियों की भूमिका पर भी प्रश्न उठाए जा रहे हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि ईचागढ़ विधानसभा क्षेत्र के विधायक, रांची लोकसभा क्षेत्र के सांसद सहित राज्य के नीति-निर्माताओं को इस स्थिति की जानकारी होने के बावजूद अब तक कोई ठोस पहल सामने नहीं आई है।
इधर, चांडिल रेंज क्षेत्र में जंगली हाथियों के बढ़ते आतंक ने ग्रामीणों की चिंता और बढ़ा दी है। ग्रामीणों के अनुसार आए दिन फसलों को नुकसान हो रहा है, मानव जान की घटनाएँ सामने आ रही हैं और कई गांव भय के माहौल में जीवन यापन कर रहे हैं। वर्तमान में विभागीय स्तर पर मृत्यु की स्थिति में ₹4 लाख का मुआवजा तथा फसल क्षति पर औपचारिक भरपाई की व्यवस्था ही प्रभावी रूप से दिखाई दे रही है।
इस संबंध में डैम विस्थापित नेता राकेश रंजन महतो ने कहा कि चांडिल रेंज क्षेत्र में हाथियों के आतंक को रोकने में वन विभाग पूरी तरह विफल साबित हो रहा है। उन्होंने कहा कि आए दिन ऐसी घटनाएँ हो रही हैं, जिनसे आम जनजीवन बुरी तरह प्रभावित हो रहा है।
राकेश रंजन महतो ने यह भी कहा कि हाथी द्वारा किसी की मौत या फसल क्षति के बाद केवल मुआवजा देकर जिम्मेदारी पूरी नहीं हो जाती। उनका कहना है कि दुर्घटनाओं से पहले रोकथाम और स्थायी समाधान आवश्यक है, लेकिन इस दिशा में प्रभावी पहल दिखाई नहीं दे रही है।
उन्होंने फसल क्षति मुआवजे को लेकर भी सवाल उठाते हुए कहा कि हाथियों द्वारा फसल नष्ट किए जाने पर तीन-चार क्विंटल के बराबर मुआवजा निर्धारित किया जाता है, वह भी एक साथ नहीं मिल पाता, जबकि गरीब किसान पूरे वर्ष उसी फसल पर निर्भर रहता है।
डैम विस्थापित नेता ने यह सवाल भी उठाया कि आज तक चांडिल डैम में डूबे प्रभावित परिवारों को न तो गांव-घर के बदले समुचित नौकरी मिली, न पर्याप्त मुआवजा और न ही जमीन के बदले जमीन। उन्होंने कहा कि ऐसे में डूब क्षेत्र की भूमि को वन क्षेत्र घोषित किया जाना विस्थापितों के लिए नई परेशानी बनकर सामने आया है।
उन्होंने बताया कि वर्ष 2009 की अधिसूचना संख्या 03 के माध्यम से ईचा डैम और चांडिल डैम क्षेत्र की लगभग 50 हजार एकड़ भूमि को वन भूमि घोषित किया गया है। इस पर उन्होंने सवाल उठाया कि क्या इस संबंध में क्षेत्र के विधायक और सांसद को जानकारी नहीं है, और यदि जानकारी नहीं है तो उन्हें अब अवगत कराया जा रहा है।
राकेश रंजन महतो ने यह भी आरोप लगाया कि वास्तविक वन क्षेत्रों में पौधारोपण की स्थिति संतोषजनक नहीं है, जबकि कई स्थानों पर अवैध खनन गतिविधियाँ संचालित हो रही हैं। उन्होंने विशेष रूप से चांडिल डैम प्रभावित क्षेत्रों में हाथियों के बढ़ते आतंक को गंभीर चिंता का विषय बताया।
इसके साथ ही उन्होंने टाल क्षेत्रों में बड़ी मात्रा में लकड़ी की आवाजाही पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि रोजाना टनों लकड़ी कहाँ से आ रही है, इसकी जांच की जानी चाहिए और वन विभाग को इस मामले को गंभीरता से लेना चाहिए।
स्थानीय स्तर पर यह मांग उठ रही है कि चांडिल डैम विस्थापितों से जुड़ी भूमि को आरक्षित वन घोषित करने के निर्णय की पुनः समीक्षा की जाए, अधिसूचना पर पुनर्विचार हो तथा विस्थापित परिवारों के अधिकारों को लेकर स्पष्ट और व्यावहारिक नीति बनाई जाए।
अब देखना यह होगा कि राज्य सरकार और संबंधित विभाग इन सवालों पर क्या रुख अपनाते हैं और विस्थापितों तथा ग्रामीणों की समस्याओं के समाधान के लिए आगे क्या कदम उठाए जाते हैं।
