जमशेदपुर : क्या औद्योगिक विकास के लिए कानूनन आवंटित जियाडा की जमीन पर भी अब दबंगई चलेगी? क्या महज आठ लोगों के विरोध के सामने सरकारी आदेश और प्रशासनिक व्यवस्था बेबस हो सकती है? और सबसे बड़ा सवाल—जब जमीन जियाडा द्वारा विधिवत आवंटित है तो वास्तविक कब्जा दिलाने में प्रशासन निर्णायक कार्रवाई से पीछे क्यों हट रहा है?

सरायकेला-खरसावां जिले के औद्योगिक क्षेत्र फेज-3 में जमीन के कब्जे को लेकर सामने आए एक मामले ने प्रशासनिक व्यवस्था और औद्योगिक हितों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अनुमंडल पदाधिकारी, सरायकेला के पत्रांक 902, दिनांक 3 अगस्त 2024 में जिन आठ व्यक्तियों का उल्लेख किया गया है, उनमें सारंगी प्रधान, शिशिर महतो, संतोष महतो, रोहित प्रधान, मृत्युंजय प्रधान, मंतोष महतो, रोहिन महतो और मोहित महतो शामिल हैं। पत्र में इन्हें वर्गीडीह एवं आसंगी क्षेत्र के ग्रामीणों के रूप में उल्लेखित करते हुए जमीन पर दखल में बाधा से संबंधित मामला सामने आता है।
30 हजार वर्गफीट जमीन, फिर भी कंपनी को कब्जा नहीं?……
मामला करीब दो दशक पुराना बताया जाता है। टाटानगर इंटरप्राइजेज प्राइवेट लिमिटेड को तत्कालीन आयडा, वर्तमान जियाडा, द्वारा औद्योगिक प्लांट स्थापित करने के उद्देश्य से प्लॉट संख्या बी-50 एवं बी-51 आवंटित किए गए थे। कंपनी के अनुसार इन दोनों प्लॉटों का कुल क्षेत्रफल करीब 30 हजार वर्गफीट है और जमीन आसंगी मौजा के खाता संख्या 45 में स्थित है. कंपनी का दावा है कि निर्धारित शुल्क लेकर उसे यह जमीन विधिवत आवंटित की गई थी। इसके बावजूद मौके पर कब्जा लेने में लगातार बाधाएं उत्पन्न होती रहीं।
एसडीओ ने नोटिस दिया, लेकिन विवाद का कानूनी आधार सामने नहीं आया…….
बताया जाता है कि मामले में अनुमंडल प्रशासन की ओर से संबंधित लोगों को नोटिस जारी कर उनका पक्ष भी मांगा गया था। कंपनी का आरोप है कि विरोध करने वालों की ओर से ऐसा कोई ठोस दस्तावेजी अथवा कानूनी आधार सामने नहीं आया, जिसके आधार पर आवंटित भूखंड पर कंपनी के कब्जे को रोका जा सके. इसके बावजूद कंपनी को वास्तविक कब्जा दिलाने के दौरान प्रशासन की कार्रवाई को लेकर सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि कब्जा दिलाने की प्रक्रिया महज औपचारिकता तक सीमित रही, न पर्याप्त पुलिस बल की मौजूदगी दिखी और न ही पर्याप्त प्रशासनिक अधिकार वाले वरीय दंडाधिकारी की प्रभावी तैनाती।
कागज सरकारी, जमीन पर किसका असर?………
मामला सिर्फ एक कंपनी तक सीमित नहीं बताया जा रहा। आरोप है कि आयडा द्वारा अधिग्रहित जमीन के एवज में आवंटित कुछ अन्य भूखंडों पर भी संबंधित लाभुकों को कब्जा लेने में परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है. यदि सरकारी एजेंसी द्वारा जमीन अधिग्रहित की गई, उसके एवज में भूखंड आवंटित किया गया और दस्तावेज भी मौजूद हैं, तो फिर मौके पर कब्जा किसके प्रभाव से रुक रहा है—यह सवाल अब प्रशासन की कार्यशैली पर ही नहीं, बल्कि पूरे औद्योगिक क्षेत्र की कानून-व्यवस्था पर भी खड़ा हो रहा है।
‘जिसकी लाठी, उसकी जमीन’ वाली स्थिति का आरोप……..
कंपनी और संबंधित पक्षों की ओर से आरोप लगाया जा रहा है कि दस्तावेजी अधिकार के बावजूद मौके पर प्रभाव और दबाव का खेल चल रहा है। आरोप यह भी है कि कुछ प्रभावशाली लोग जमीन पर अपना दावा मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं. हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है, लेकिन यदि विधिवत आवंटित औद्योगिक भूखंड पर बाहरी दबाव के कारण कंपनी को प्रवेश तक नहीं मिल पा रहा है, तो यह सीधे तौर पर कानून के शासन और औद्योगिक निवेश के माहौल से जुड़ा गंभीर प्रश्न बन जाता है।
सांसद की भूमिका पर भी उठ रहे सवाल……
इस पूरे प्रकरण में एक सांसद के नाम को लेकर भी चर्चा सामने आई है। कंपनी की ओर से दावा किया जाता है कि एक प्रभावशाली व्यक्ति द्वारा उसे प्लॉट पर जाने से रोका जाता रहा और एक सांसद की ओर से कथित तौर पर दूसरी जगह प्लॉट दिलाने की बात कही गई. इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि किए बिना किसी व्यक्ति पर आरोप तय करना उचित नहीं होगा। लेकिन सवाल यह है कि यदि कंपनी के पास जियाडा का विधिवत आवंटन है, तो उसे उसी भूखंड पर कब्जा दिलाने के बजाय किसी दूसरे भूखंड का विकल्प क्यों सुझाया जा रहा है?
उद्योग हितैषी संगठन आखिर चुप क्यों?…….
औद्योगिक क्षेत्र में जमीन के अधिकार और निवेश की सुरक्षा से जुड़ा मामला होने के बावजूद औद्योगिक संगठनों की चुप्पी भी चर्चा का विषय बनी हुई है। आरोप है कि जिन संगठनों को उद्योग हित और औद्योगिक निवेश की सुरक्षा के मुद्दे पर आगे आना चाहिए, वे इस प्रकरण में मुखर नहीं हैं।
सवालों की फेहरिस्त लंबी होती जा रही है……
जियाडा का आवंटन है तो कब्जा क्यों नहीं?
प्रशासनिक आदेश है तो जमीन पर अमल क्यों नहीं?
विरोध करने वालों का कानूनी आधार नहीं है तो कार्रवाई में ढिलाई क्यों?
कंपनी को दूसरे प्लॉट का विकल्प देने की नौबत क्यों आई?
क्या औद्योगिक जमीन पर कानून चलेगा या प्रभावशाली लोगों का दबदबा?……
इस पूरे मामले में प्रशासन, जियाडा, कंपनी और आरोपित पक्षों का आधिकारिक पक्ष सामने आना बेहद जरूरी है। क्योंकि मामला केवल एक प्लॉट का नहीं, बल्कि सरकारी एजेंसी द्वारा आवंटित औद्योगिक जमीन पर कानून के राज और निवेशकों के भरोसे का है।
