चाणक्य | लोकतंत्र सवेरा : का हो बिहार वालो! जरा सोचल जाव कि जे बिहार के माटी से निकलल मेहनतकश लोग अपना खून-पसीना से दिल्ली, मुंबई, पंजाब आ देश के दोसर बड़ शहर के विकास में आपन योगदान देत बा, ओही बिहार के गाँव आज बाढ़ के पानी में घेराइल बा। कहीं गरीब के घर-आँगन में पानी घुसल बा, कहीं किसान के लहलहात फसल बरबाद हो रहल बा, त कहीं लोग आपन घर-दुआर छोड़ के सुरक्षित ठिकाना खोजे खातिर मजबूर बा। बाढ़ के ई तबाही खाली घर, खेत आ सड़क के नुकसान नइखे, बलुक हजारन परिवार के सपना, मेहनत आ रोजी-रोटी पर पड़ल चोट बा. बाकिर सबसे बड़ सवाल ई बा कि बिहार के एह पीड़ा के आवाज देश-दुनिया तक ओतना जोर से काहे नइखे पहुँचत?** का बिहारी के दुख-दर्द के कवनो मोल नइखे? का गरीब के घर उजड़ला के खबर तबे बड़ा खबर बनी, जब पूरा गाँव तबाही के चपेट में आ जाई?

### देश बनावे वाला बिहारी, अपना बिहार के उजड़त देखे पर मजबूर!……
बिहार के मजदूर अपना मेहनत से दूसर राज्य के इमारत खड़ा करेला। बिहारी किसान खेत में पसीना बहावेला, नौजवान अपना हुनर से देश के तरक्की में हाथ बँटावेला। देश के कोना-कोना में बिहार के लोग आपन मेहनत आ काबिलियत के पहचान बनवले बा. बाकिर जब अपना बिहार पर बाढ़ के आफत टूटेला, जब गाँव के गली-मोहल्ला पानी में डूबे लागेला, जब किसान के महीनन के मेहनत पानी में बह जाए लागेला, तब सवाल उठल लाजिमी बा कि आखिर बिहार के जनता के सुरक्षा के जिम्मेदारी केकर बा?
जे हाथ दूसर के घर बनावेला, ऊहे हाथ अपना टूटल घर के मलबा हटावे पर मजबूर काहे हो जाला? जे किसान दूसर के थाली तक अनाज पहुँचावेला, ओकर आपन खेत हर साल बाढ़ के मार काहे झेलेला? ई सवाल खाली भावुकता के नइखे, ई सवाल बिहार के विकास, व्यवस्था आ जनता के अधिकार से जुड़ल बा।
### हर साल बाढ़, हर साल तबाही, आखिर स्थायी समाधान कब?……..
बिहार में बाढ़ के संकट कवनो नया बात नइखे। बरखा के मौसम आवते कई इलाका में नदी के जलस्तर बढ़े, तटबंध पर दबाव पड़े, जलनिकासी के समस्या सामने आवे आ गाँव-गिरांव में पानी घुसे के खतरा बढ़ जाला। बाढ़ के असर से खेती-किसानी, सड़क, आवागमन, पढ़ाई-लिखाई आ रोजी-रोटी तक प्रभावित हो जाला. एह बीच सबसे जादे मार गरीब परिवार, छोट किसान, दिहाड़ी मजदूर आ कमजोर तबका पर पड़ेला। घर में पानी घुसला से अनाज, कपड़ा, जरूरी कागजात आ घरेलू सामान खराब हो जाला। मवेशी खातिर चारा जुटावल मुश्किल हो जाला। बच्चा के पढ़ाई छूटेला आ परिवार के रोज के जिनगी संकट में पड़ जाला।
त सवाल ई बा कि जब बाढ़ के खतरा हर साल सामने आवेला, त ओकरा से निपटे खातिर पहिले से तैयारी काहे ना होखे? संवेदनशील गाँव के पहचान, मजबूत तटबंध, बेहतर जलनिकासी, समय पर चेतावनी आ सुरक्षित ठिकाना के व्यवस्था पर पूरा जोर काहे ना दिहल जाव? खाली बैठक, भाषण आ कागजी योजना से बाढ़ के पानी ना रुकी। जरूरत बा जमीन पर ठोस काम के, ताकि हर साल जनता के एके मुसीबत से ना गुजरे के पड़े।**
राहत जरूरी बा, बाकिर बचाव के इंतजाम ओकरा से भी जरूरी!…….
आपदा के समय पीड़ित परिवार तक राहत पहुँचावल सरकार आ प्रशासन के जरूरी जिम्मेदारी बा। बाढ़ में फँसल लोग के सुरक्षित निकाले, भोजन, पीए के साफ पानी, दवाई, पशुचारा आ अस्थायी आश्रय के इंतजाम समय पर होखे के चाहीं. साथे-साथ बाढ़ से बर्बाद फसल आ क्षतिग्रस्त मकान के नुकसान के आकलन पारदर्शी तरीका से होखे आ पात्र परिवार तक सहायता आ मुआवजा समय पर पहुँचे, ई भी जरूरी बा. बाकिर सवाल ई बा कि का बिहार के जनता हर साल राहत के इंतजार करे खातिर मजबूर रहो? का हर साल घर उजड़े, फसल डूबे, रोजगार छूटे आ फेर सहायता खातिर दफ्तर-दफ्तर चक्कर लगावे के पड़े?
जनता के मदद मिलल ओकर हक बा, एह में कवनो एहसान के बात नइखे। बाकिर सरकार आ जनप्रतिनिधि लोग के जिम्मेदारी खाली राहत बाँटे तक सीमित नइखे। बाढ़ के नुकसान कम करे आ भविष्य में तबाही से बचे के इंतजाम कइलो ओतने जरूरी बा।
### पानी उतर जाला, बाकिर गरीब के दुख ना उतरेला!……..
जरा ओह परिवार के हालत के कल्पना करीं, जे अपना पूरा जिनगी के कमाई जोड़ के एगो छोट घर बनवले रहे। घर में बच्चा के भविष्य के सपना रहे, बूढ़ माई-बाप के सहारा रहे आ आँगन में परिवार के खुशहाली बसल रहे. अचानक बाढ़ के पानी घर में घुस गइल। अनाज खराब हो गइल, सामान बह गइल, मवेशी खातिर चारा ना बचल आ परिवार के सुरक्षित ठिकाना खोजे के नौबत आ गइल. अब बताईं, ओह परिवार के नुकसान के भरपाई के करी? बच्चा के छूटल पढ़ाई के नुकसान के पूरा करी? किसान के बरबाद फसल के कीमत के चुकाई? आ बरिसन के मेहनत से बनल घर उजड़ला के दर्द के कम करी?
नदी के पानी उतर जाला, बाकिर गरीब के परेशानी ना उतरेला। खेत से पानी निकल जाला, बाकिर किसान के कर्ज आ नुकसान के बोझ ना हटेला। घर सूख जाला, बाकिर उजड़ल परिवार के आँख के लोर जल्दी ना सूखे ला।**
एही से बाढ़ के समस्या के खाली बरखा के मौसम तक सीमित मानल ठीक ना होई। ई समस्या जनता के सुरक्षा, रोजगार, खेती-किसानी आ सम्मान से जुड़ल बा।
सरकार आ जनप्रतिनिधि लोग से जनता के सीधा सवाल……..
बिहार के जनता के अब खाली आश्वासन ना, साफ जवाब आ ठोस काम चाहीं। सरकार, प्रशासन आ जनप्रतिनिधि लोग के सामने कुछ जरूरी सवाल बा।
– बाढ़ प्रभावित इलाका में समय पर राहत पहुँचावे के पुख्ता इंतजाम का बा?
– कमजोर तटबंध आ जलनिकासी के समस्या दूर करे खातिर कवन ठोस कदम उठावल जा रहल बा?
– बाढ़ से बर्बाद फसल आ क्षतिग्रस्त मकान के मुआवजा पात्र परिवार के कब मिली?
– पानी में फँसल बच्चा, बुजुर्ग, महिला आ बीमार लोग के सुरक्षित निकाले के व्यवस्था कतना मजबूत बा?
– हर साल बाढ़ झेले वाला गाँव के सुरक्षा खातिर लंबा समय के योजना का बा?
– अगिला बरिस फेर बाढ़ के खतरा सामने आई, त जनता के बचावे खातिर पहिले से का तैयारी रही?
ई सवाल कवनो दल के विरोध भा समर्थन में नइखे। ई सवाल बिहार के जनता के जिनगी आ भविष्य से जुड़ल बा। जनता के अधिकार बा कि ऊ अपना चुनेल प्रतिनिधि से काम के हिसाब माँगे आ सरकार से जवाबदेही के उम्मीद करे।
### बिहार के जनता दया ना, अपना हक के सुरक्षा माँगत बिया!………
बिहार के लोग मेहनती बा, बिहार के माटी में ताकत बा आ बिहार के नौजवान में आगे बढ़े के जज्बा बा। बाकिर मेहनत के मतलब ई नइखे कि जनता हर साल आपदा के मार चुपचाप सहत रहे. बिहार के किसान के आपन फसल के सुरक्षा चाहीं। मजदूर के परिवार के सुरक्षित घर चाहीं। बच्चा के पढ़ाई लगातार जारी रहे, एह खातिर व्यवस्था चाहीं। बाढ़ प्रभावित परिवार के समय पर राहत आ मुआवजा चाहीं। आ सबसे बढ़ के, बाढ़ के खतरा कम करे खातिर दूरगामी योजना आ ओकर ईमानदार क्रियान्वयन चाहीं. बिहार के जनता दया ना माँगत बिया, अपना हक के सुरक्षा माँगत बिया। जनता के खाली भरोसा ना, भरोसा के जमीन पर उतरल रूप चाहीं।
### अब जागे के बारी बा!…
ए बिहार के हुक्मरान लोग! बाढ़ के पानी के संगे जनता के पीड़ा के बह जाए मत दीं। बरखा बीतला के बाद समस्या के भुला मत दीं। पानी उतरला के बाद तटबंध, जलनिकासी, राहत व्यवस्था आ भविष्य के तैयारी के समीक्षा होखे। जहाँ कमी बा, उहाँ सुधार होखे। जहाँ लापरवाही बा, उहाँ जवाबदेही तय होखे. काहे कि बाढ़ खाली प्राकृतिक संकट नइखे, एकर नुकसान कतना होई, ई बहुत हद तक तैयारी, प्रशासनिक व्यवस्था आ समय पर कार्रवाई पर भी निर्भर करेला. बिहार के जनता हर साल तबाही के इंतजार ना करे, बलुक सुरक्षित जिनगी जिए—एह दिशा में काम होखे के चाहीं। किसान के मेहनत बचे, गरीब के घर बचे, बच्चा के भविष्य बचे आ गाँव के विकास के रफ्तार ना रुके।
ए सरकार! अब खाली भरोसा मत दीं, भरोसा के जमीन पर उतारीं। बिहार के लोग देश बनावेला, अब बिहार के बचावे के बारी बा!**
