लोकतंत्र सवेरा | मां दुर्गा की विदाई का दृश्य हमेशा भावुक करने वाला होता है। नम आंखें, जुड़े हाथ और मन में एक ही प्रार्थना— हे मां, अगले बरस फिर आना। कोई मां के चरणों में अपनी पीड़ा अर्पित करता है, तो कोई सुख-समृद्धि की कामना। लेकिन इसी पवित्र क्षण में जब भक्ति गीतों की जगह फूहड़ गानों का शोर सुनाई देने लगे, तो सवाल उठना लाजिमी है— आखिर हम अपनी आस्था और संस्कृति को किस दिशा में ले जा रहे हैं?
मां की विदाई थी या फूहड़ गीतों की प्रतियोगिता ?…….
विसर्जन के दौरान कुछ जुलूसों में “तोहार लहंगा उठा देम रिमोट से”, “रंगदार से सीख रंगदारी”, “प्रखंड हो या जिला बहुआने से हिला”, “नया-नया ड्राइवर ह”, “लहरिया लूट ए राजा”, “मैडम के बनल बाजार बा”, “चुम्मा-चुम्मा दे-दे चुम्मा”, “कमरिया करे लापा-लप” और “भतीजा तोर माई जिंदाबाद, मौसी जिंदाबाद” जैसे गीतों ने धार्मिक आयोजनों की मर्यादा को तार तार कर गया. यह सवाल किसी भाषा या कलाकार के खिलाफ नहीं, बल्कि गीतों के चयन और धार्मिक अवसरों के प्रति हमारी जिम्मेदारी का है। भोजपुरी सहित तमाम क्षेत्रीय भाषाओं में समृद्ध लोकसंगीत की परंपरा है, लेकिन लोकसंस्कृति और फूहड़ मनोरंजन के बीच अंतर समझना भी जरूरी है।
### डीजे की आवाज ऊंची, लेकिन क्या भक्ति का भाव भी उतना ही ऊंचा है?……..
डिजिटल दौर में हर आयोजन को कैमरे में कैद करने, रील बनाने और वायरल होने की होड़ बढ़ी है। तकनीक का इस्तेमाल गलत नहीं, लेकिन क्या वायरल होने की चाह में हम परंपराओं की गरिमा को पीछे छोड़ रहे हैं? जब मां की विदाई भजन, देवी स्तुति, ढोल-नगाड़ों और पारंपरिक संगीत के साथ हो सकती है, तो ऐसे गीतों को प्राथमिकता क्यों दी जाए, जिनके बोल पारिवारिक माहौल में भी असहजता पैदा करें?
गाने की धुन से ज्यादा शोर, संगीत से ज्यादा प्रदर्शन और भक्ति से ज्यादा दिखावा— क्या यही आधुनिकता है?……..
उत्सव मनाना, नाचना-गाना गलत नहीं है। लेकिन उत्साह के साथ सामाजिक जिम्मेदारी भी जरूरी है। धार्मिक आयोजनों में बच्चे, महिलाएं, बुजुर्ग और परिवार शामिल होते हैं। उनकी भावनाओं और सहजता का सम्मान करना पूरे समाज का दायित्व है।
### आयोजक, डीजे संचालक और प्रशासन— सबकी जिम्मेदारी…..
पूजा समितियों को गीतों के चयन और ध्वनि स्तर को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देश तय करने चाहिए। डीजे संचालकों को व्यावसायिक लाभ से ऊपर सामाजिक और सांस्कृतिक जिम्मेदारी रखनी चाहिए। वहीं, प्रशासन को निर्धारित ध्वनि मानकों और लागू नियमों का पालन सुनिश्चित करना चाहिए. आखिर धार्मिक आयोजनों का उद्देश्य समाज को जोड़ना, श्रद्धा जगाना और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करना है, न कि शोर की प्रतिस्पर्धा खड़ी करना।
### हे मां शेरावाली! थोड़ा सद्बुद्धि दीजिए…..
मां से हम सुख, शांति, समृद्धि और परिवार की खुशहाली मांगते हैं। लेकिन क्या हम यह भी प्रार्थना करते हैं कि हमें सही-गलत का अंतर समझने की बुद्धि मिले? हमारे उत्साह में अनुशासन हो और आधुनिकता के साथ संस्कारों के लिए भी जगह हो. डिजिटल दुनिया में वायरल होना कुछ घंटों की उपलब्धि हो सकती है, लेकिन समाज के मन में सम्मान अर्जित करना वर्षों की साधना है. वीडियो के व्यूज घट-बढ़ सकते हैं, लेकिन हमारी सांस्कृतिक पहचान पर पड़ने वाला प्रभाव लंबे समय तक रह सकता है।
सवाल किसी की आस्था पर नहीं, अपनी सोच पर है. हम अपनी धार्मिक परंपराओं को अगली पीढ़ी के लिए अधिक सुंदर, सभ्य और संस्कारपूर्ण बनाकर छोड़ना चाहते हैं या उन्हें केवल तेज डीजे और विवादित गीतों तक सीमित कर देना चाहते हैं?
मां दुर्गा की विदाई में आंखें श्रद्धा से नम हों, हृदय भक्ति से भरा हो और वातावरण ऐसा हो कि बुजुर्गों को सम्मान, महिलाओं को सहजता, बच्चों को अच्छे संस्कार और युवाओं को अपनी संस्कृति पर गर्व महसूस हो।
**हे मां शेरावाली! हमें ऐसी सद्बुद्धि दीजिए कि आधुनिकता की दौड़ में हम अपनी मर्यादा न खोएं, मनोरंजन के नाम पर अपनी संस्कृति को कमजोर न करें और आपकी विदाई को शोर नहीं, श्रद्धा का उत्सव बना सकें।


