कोलकाता/बहरामपुर : पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में सत्ता गंवाने के बाद तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर की कलह अब खुलकर सामने आ गई है। अपनी 28 साल की राजनीतिक यात्रा में टीएमसी आज सबसे नाजुक मोड़ पर खड़ी है। विधानसभा में पार्टी के 80 विधायकों में से 58 विधायकों ने खुली बगावत कर दी है, जिससे सूबे में ममता बनर्जी की संगठनात्मक पकड़ पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।



ममता बनर्जी को संसद भेजने की तैयारी और नया विवाद
बंगाल चुनाव में भवानीपुर सीट से खुद हारने के बाद ममता बनर्जी फिलहाल किसी भी सदन की सदस्य नहीं हैं। ऐसे में राष्ट्रीय राजनीति में अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने और दिल्ली में पार्टी को नेतृत्व देने के लिए उन्हें लोकसभा भेजने की रणनीति बनाई जा रही थी। रणनीतिकारों की नजर बहरामपुर लोकसभा सीट पर थी, जहां से पूर्व क्रिकेटर यूसुफ पठान सांसद हैं।
मीडिया रिपोर्ट्स और सूत्रों के हवाले से यह दावा किया जा रहा था कि:
- टीएमसी नेतृत्व ने पूर्व भारतीय कप्तान सौरव गांगुली के जरिए यूसुफ पठान तक संदेश भिजवाया था कि वे बहरामपुर सीट से इस्तीफा दे दें, ताकि वहां होने वाले उपचुनाव में ममता बनर्जी लड़ सकें।
- खबरों में यह भी दावा किया गया कि यूसुफ पठान ने इस प्रस्ताव को ठुकराते हुए इस्तीफा देने से साफ इनकार कर दिया है।
सौरव गांगुली ने चिट्ठी जारी कर बताया पूरा सच
इस पूरे विवाद में नाम आने के बाद पूर्व क्रिकेट कप्तान सौरव गांगुली ने सभी मीडिया घरानों को एक आधिकारिक पत्र जारी कर इन दावों को सिरे से खारिज कर दिया है। गांगुली ने साफ किया:
“ममता बनर्जी ने मुझे कभी भी यूसुफ पठान को सीट छोड़ने के लिए कहने या ऐसा कोई संदेश देने के लिए नहीं कहा। मैंने इस सिलसिले में यूसुफ पठान से कोई संपर्क नहीं किया है, इसलिए उनके मना करने का सवाल ही पैदा नहीं होता। मेरा राजनीति से कोई लेना-देना नहीं है और मीडिया को बिना सच्चाई जांचे ऐसी अफवाहें नहीं उड़ानी चाहिए।”
दूसरी तरफ, सांसद यूसुफ पठान ने भी साफ किया है कि पार्टी या ममता बनर्जी की तरफ से उन पर सीट छोड़ने का कोई दबाव नहीं बनाया गया है और मीडिया में चल रही खबरें निराधार हैं।
टीएमसी के सामने अस्तित्व का संकट
भले ही सीट छोड़ने की खबर पर स्पष्टीकरण आ गया हो, लेकिन टीएमसी के भीतर का संकट कम नहीं हुआ है। विधानसभा अध्यक्ष द्वारा 58 बागी विधायकों को सदन में मुख्य विपक्षी गुट के रूप में मान्यता देने के बाद पार्टी कानूनी और राजनीतिक दोनों मोर्चों पर बैकफुट पर है। बागी विधायकों का कहना है कि वे ममता बनर्जी को ‘मुख्य सलाहकार’ मानने को तैयार हैं, लेकिन अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व को स्वीकार नहीं करेंगे। अब देखना यह होगा कि बंगाल की राजनीति में ‘दीदी’ के नाम से मशहूर ममता बनर्जी इस सबसे बड़े आंतरिक विद्रोह से अपनी पार्टी को कैसे बचा पाती हैं।



