लोकतंत्र सवेरा/जमशेदपुर: हादसा चाहे किसी कंपनी परिसर में हो या सड़क पर, उसका दर्द सिर्फ घटनास्थल तक सीमित नहीं रहता। एक हादसा किसी परिवार की पूरी जिंदगी बदल देता है। किसी घर का कमाने वाला चला जाता है, किसी मां का आंचल सूना हो जाता है, किसी पत्नी का सुहाग उजड़ जाता है और बच्चों के सिर से पिता का साया उठ जाता है। लेकिन सवाल यह है कि हादसे के बाद हमारी व्यवस्था का पहला और सबसे बड़ा जवाब क्या होता है—सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करना या फिर मुआवजे की रकम तय करना?

हादसा होता है। मौत होती है। घायल अस्पताल पहुंचते हैं। परिवार सड़क पर आता है। जनप्रतिनिधि पहुंचते हैं। अधिकारी पहुंचते हैं। कंपनी प्रबंधन और प्रशासन के बीच बातचीत शुरू होती है। इसके बाद शुरू होती है मांग, वार्ता, आश्वासन और मुआवजे की प्रक्रिया। कई मामलों में मामला आर्थिक सहायता तक पहुंचता है और धीरे-धीरे सब कुछ सामान्य मान लिया जाता है. लेकिन जिस सवाल का जवाब सबसे पहले मिलना चाहिए, वह अक्सर पीछे छूट जाता है—आखिर हादसा हुआ क्यों?
मौत के बाद रकम तय होगी, लेकिन जिंदगी की कीमत कौन तय करेगा?
किसी परिवार के लिए मुआवजे की रकम कभी उसके खोए हुए सदस्य की भरपाई नहीं कर सकती। पैसा तत्काल आर्थिक संकट को कुछ हद तक संभाल सकता है, लेकिन क्या वह उस बच्चे का भविष्य वापस ला सकता है जिसने अपने पिता को खो दिया? क्या वह मां की गोद फिर भर सकता है? क्या वह पत्नी का उजड़ा संसार वापस ला सकता है? फिर सवाल यह भी है कि क्या हर हादसे के बाद परिवार को मुआवजे के लिए सड़क पर उतरना पड़ेगा? क्या हर मौत के बाद धरना, प्रदर्शन, वार्ता और दबाव के बाद ही सहायता मिलेगी? अगर ऐसा है, तो फिर सुरक्षा व्यवस्था की जिम्मेदारी किसकी है? कंपनी हादसा हो या सड़क दुर्घटना—जिम्मेदारी तय क्यों नहीं?
कंपनी परिसर में दुर्घटना होती है तो सुरक्षा मानकों की जांच होनी चाहिए। यह देखा जाना चाहिए कि सुरक्षा प्रोटोकॉल का पालन हुआ या नहीं, मशीनरी सुरक्षित थी या नहीं, कर्मचारियों को आवश्यक सुरक्षा उपकरण मिले थे या नहीं और संबंधित अधिकारियों ने समय-समय पर निरीक्षण किया था या नहीं. इसी तरह सड़क दुर्घटना होने पर सिर्फ चालक को जिम्मेदार ठहराकर मामला खत्म कर देना पर्याप्त नहीं है। सड़क की स्थिति कैसी थी? प्रकाश व्यवस्था कैसी थी? डिवाइडर, संकेतक और ट्रैफिक नियंत्रण की व्यवस्था कैसी थी? भारी वाहनों की आवाजाही के लिए क्या नियम लागू थे? स्कूल वाहनों और व्यावसायिक वाहनों की जांच कितनी नियमित होती है? ब्लैक स्पॉट चिन्हित किए गए या नहीं?
हर हादसे के बाद इन सवालों के जवाब सार्वजनिक क्यों नहीं किए जाते?……
हादसे के बाद सक्रियता क्यों, हादसे से पहले रोकथाम क्यों नहीं?
सबसे बड़ा सवाल सिस्टम की कार्यप्रणाली पर है……
हादसा होने के बाद प्रशासन सक्रिय होता है। पुलिस पहुंचती है। अधिकारी घटनास्थल का जायजा लेते हैं। जनप्रतिनिधि बयान देते हैं। मुआवजे की मांग उठती है। लेकिन क्या यही सक्रियता हादसे से पहले दिखाई नहीं दे सकती?
अगर किसी सड़क पर लगातार दुर्घटनाएं हो रही हैं तो वहां स्थायी सुरक्षा उपाय क्यों नहीं किए जाते?
अगर किसी औद्योगिक परिसर में बार-बार दुर्घटनाएं सामने आती हैं तो सुरक्षा ऑडिट और जवाबदेही की प्रक्रिया कितनी सख्ती से लागू होती है?
अगर किसी इलाके में भारी वाहनों की आवाजाही से लगातार खतरा पैदा हो रहा है तो प्रशासन दुर्घटना का इंतजार क्यों करे?
सिस्टम का काम सिर्फ हादसे के बाद प्रतिक्रिया देना है या हादसा होने से पहले उसे रोकना भी है?
राजनीति हो, लेकिन मौत को राजनीतिक मुद्दा बनाकर छोड़ देना कितना उचित?
दुर्घटना के बाद जनप्रतिनिधियों और सामाजिक संगठनों का पीड़ित परिवार के साथ खड़ा होना जरूरी है। पीड़ितों को न्याय और सहायता दिलाने के लिए आवाज उठाना लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है. लेकिन सवाल तब उठता है जब किसी मौत के बाद पूरी बहस सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी और मुआवजे की रकम तक सीमित हो जाए. मृतक के परिवार को तत्काल आर्थिक सहायता मिलनी चाहिए, लेकिन उसके साथ-साथ यह भी तय होना चाहिए कि जिस कारण से हादसा हुआ, उसे दोबारा होने से रोकने के लिए क्या किया जाएगा. वरना आज एक परिवार को मुआवजा मिलेगा, कल किसी दूसरे परिवार की बारी होगी और हादसों का यह सिलसिला चलता रहेगा।
सरकार और संबंधित विभाग से सीधे सवाल……
– हादसों की रोकथाम के लिए दीर्घकालिक नीति क्या है?
– लगातार दुर्घटना वाले क्षेत्रों की पहचान और सुधार की व्यवस्था कितनी प्रभावी है?
– औद्योगिक इकाइयों में सुरक्षा मानकों की नियमित निगरानी कौन और कितनी गंभीरता से करता है?
– सड़क निर्माण के बाद उसकी सुरक्षा ऑडिट कितनी नियमित होती है?
– ब्लैक स्पॉट चिन्हित होने के बाद उन्हें सुरक्षित बनाने की समयसीमा क्या है?
– भारी वाहनों की आवाजाही, गति सीमा और नो-एंट्री नियमों का पालन कितना प्रभावी है?
– हादसे के बाद जांच रिपोर्ट सार्वजनिक होती है तो उसकी अनुशंसाओं पर कार्रवाई कब और कैसे होती है?
– क्या किसी हादसे के बाद सिर्फ मुआवजा देकर प्रशासनिक जिम्मेदारी पूरी मान ली जाती है?
– हादसों में कमी लाने के लिए विभागवार जवाबदेही क्यों तय नहीं की जाती?
प्रशासन और कंपनियों से भी सवाल….
प्रशासन से सवाल है. दुर्घटना होने के बाद पहुंचना जरूरी है, लेकिन दुर्घटना रोकने के लिए पहले से निगरानी क्यों नहीं?
कंपनी प्रबंधन से सवाल है. उत्पादन जितना महत्वपूर्ण है, क्या कर्मचारी की सुरक्षा भी उतनी ही प्राथमिकता है?
ट्रैफिक विभाग से सवाल है. चालान और जांच से आगे बढ़कर दुर्घटना रोकने की स्थायी योजना क्या है?
सड़क निर्माण और संबंधित विभागों से सवाल है. सड़क सिर्फ बना देना पर्याप्त है या उसकी सुरक्षा, डिजाइन और रखरखाव की जिम्मेदारी भी उतनी ही जरूरी है?
श्रम विभाग से सवाल है. मजदूरों की सुरक्षा से जुड़े नियमों का वास्तविक धरातल पर कितना निरीक्षण होता है?
अब जरूरत ‘मुआवजा मॉडल’ नहीं, ‘सुरक्षा मॉडल’ की है…….
हर मौत के बाद परिवार को मुआवजा मिलना जरूरी हो सकता है, लेकिन इसे व्यवस्था की सफलता का प्रमाण नहीं माना जा सकता। असली सफलता तब होगी जब हादसों की संख्या कम होगी और परिवारों को अपने किसी सदस्य की जान के बदले मुआवजे के लिए संघर्ष ही नहीं करना पड़ेगा. जरूरत इस बात की है कि हर बड़े हादसे के बाद सिर्फ मृतक के परिवार को मुआवजा देने की प्रक्रिया न हो, बल्कि हादसे के कारणों की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच, जिम्मेदारी का निर्धारण और भविष्य में ऐसी घटना रोकने की बाध्यकारी कार्ययोजना भी सामने आए।
क्योंकि सवाल सिर्फ यह नहीं है कि मृतक के परिवार को कितनी रकम मिली।
सवाल यह है कि अगली मौत रोकने के लिए सिस्टम ने क्या किया?
और अगर अगली दुर्घटना भी उसी कारण से होती है, तो फिर जवाबदेह कौन होगा?
क्या सरकार और प्रशासन हादसे के बाद मुआवजे की रकम तय करने वाली व्यवस्था से आगे बढ़कर ऐसी व्यवस्था बनाएंगे, जिसमें हादसे होने से पहले सुरक्षा सुनिश्चित हो?
क्योंकि एक जिंदगी की कीमत मुआवजे से नहीं लगाई जा सकती। जिंदगी बचाना ही किसी भी व्यवस्था की पहली जिम्मेदारी होनी चाहिए।
