होटलों और ढाबों में ग्राहकों की सेहत से खिलवाड़, मोबाइल फूड टेस्टिंग लैब ने पकड़ी संदिग्ध खाद्य सामग्री
दीपावली से पहले खाद्य पदार्थों की जांच तेज, मौके पर संदिग्ध सामग्री नष्ट, नमूने जांच के लिए भेजे गये
मिलावटखोरों पर 10 लाख रुपये तक जुर्माना और गंभीर मामलों में उम्रकैद तक का प्रावधान
जमशेदपुर। शहर में लोगों की थाली तक अब सिर्फ भोजन नहीं, बल्कि बीमारियों का खतरा भी पहुंच रहा है। ग्राहकों को लुभाने और खाद्य पदार्थों को आकर्षक दिखाने की होड़ में कुछ होटल और ढाबा संचालक लोगों की सेहत से खुलेआम खिलवाड़ कर रहे हैं। अंडों और मछलियों को आकर्षक रंग देने के लिए अखाद्य रंगों के इस्तेमाल का सनसनीखेज मामला खाद्य सुरक्षा विभाग की छापेमारी में सामने आया है। यानी खाने की गुणवत्ता से ज्यादा उसकी बाहरी खूबसूरती पर जोर दिया जा रहा है और इसकी कीमत आम आदमी की सेहत को चुकानी पड़ सकती है।
हैरानी की बात यह है कि जिन खाद्य पदार्थों को लोग भरोसे के साथ खरीदते और खाते हैं, उन्हीं में मिलावट का खतरा सामने आ रहा है। होटलों और ढाबों में की गयी जांच के दौरान अंडों, मछलियों और अन्य खाद्य सामग्रियों में संदिग्ध एवं अखाद्य रंगों के इस्तेमाल की आशंका मिली। खाद्य सुरक्षा विभाग की छह सदस्यीय टीम ने मोबाइल फूड टेस्टिंग लैब के साथ विभिन्न प्रतिष्ठानों में पहुंचकर खाद्य पदार्थों की जांच की। इस दौरान संदेहास्पद सामग्री पकड़ी गयी। संबंधित सामग्री को मौके पर नष्ट कराया गया, जबकि आवश्यक नमूने लेकर प्रयोगशाला जांच के लिए भेजे गये हैं। अब अंतिम रिपोर्ट आने के बाद संबंधित कारोबारियों के खिलाफ आगे की कानूनी कार्रवाई की जायेगी।
### रंगीन भोजन के पीछे छिपा सेहत का खतरा……..
खाद्य पदार्थों को आकर्षक दिखाने के लिए इस्तेमाल किये जाने वाले अखाद्य रंग शरीर के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकते हैं। खासकर जब ऐसे पदार्थ नियमित रूप से भोजन का हिस्सा बनते हैं, तो उपभोक्ताओं की सेहत पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका रहती है। अंडे और मछली जैसे रोजमर्रा के खाद्य पदार्थों में इस तरह की गड़बड़ी सामने आना खाद्य कारोबार की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है। सवाल यह भी है कि ग्राहकों को परोसे जाने वाले भोजन की गुणवत्ता की जिम्मेदारी आखिर कौन सुनिश्चित करेगा?
खाद्य सुरक्षा पदाधिकारी डॉ. संजय कुमार के नेतृत्व में यह अभियान चलाया जा रहा है। सिविल सर्जन डॉ. साहिर पाल के निर्देश पर विभाग की टीम शहर के प्रमुख बाजारों, होटलों, ढाबों और खाद्य प्रतिष्ठानों में लगातार जांच कर रही है। कारोबारियों को स्पष्ट चेतावनी दी गयी है कि खाद्य पदार्थों में मिलावट, प्रतिबंधित रंगों अथवा असुरक्षित सामग्री का इस्तेमाल किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जायेगा। दोबारा अनियमितता मिलने पर खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम के तहत कार्रवाई की जायेगी।
दीपावली की मिठास में मिलावट का कड़वा खेल रोकने की तैयारी…….
दीपावली नजदीक आते ही बाजारों में मिठाई, खोवा, पनीर, दूध, नमकीन और अन्य खाद्य पदार्थों की मांग तेजी से बढ़ने लगी है। त्योहारों के मौसम में बढ़ती खपत के बीच मिलावटखोरों की सक्रियता की आशंका भी बढ़ जाती है। अधिक मुनाफे के लालच में कुछ कारोबारी घटिया गुणवत्ता वाली सामग्री, कृत्रिम रंगों और प्रतिबंधित रसायनों का इस्तेमाल कर सकते हैं। ऐसे में त्योहार की मिठास कहीं लोगों की सेहत के लिए मुसीबत न बन जाये, इसे देखते हुए पूर्वी सिंहभूम जिला खाद्य सुरक्षा विभाग ने निगरानी और जांच अभियान तेज कर दिया है. इस अभियान में नामकुम से आयी मोबाइल फूड टेस्टिंग लैब को भी लगाया गया है। इसके माध्यम से दुकानों, होटलों और खाद्य स्टॉलों पर खाद्य पदार्थों की प्रारंभिक जांच की जा रही है। मौके पर संदिग्ध खाद्य सामग्री की पहचान कर नमूने एकत्र किये जा रहे हैं, ताकि प्रयोगशाला की विस्तृत जांच के बाद मिलावट की वास्तविक स्थिति और जिम्मेदार लोगों का पता लगाया जा सके।
मिलावटखोरों के लिए कानून में कड़े प्रावधान…….
खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम, 2006 के तहत मिलावटी और असुरक्षित खाद्य पदार्थों की बिक्री पर अलग-अलग दंड का प्रावधान है। स्वास्थ्य को नुकसान नहीं पहुंचाने वाली मिलावट के मामलों में भी दो लाख रुपये तक जुर्माना लगाया जा सकता है। वहीं, असुरक्षित खाद्य पदार्थों से स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचने की स्थिति में अपराध की गंभीरता के अनुसार सजा और जुर्माने का प्रावधान है। गंभीर मामलों में सात वर्ष से लेकर आजीवन कारावास तक की सजा हो सकती है। यदि असुरक्षित खाद्य पदार्थ के सेवन से किसी व्यक्ति की मृत्यु होती है, तो दोषी को कम से कम सात वर्ष की कैद, जिसे आजीवन कारावास तक बढ़ाया जा सकता है, तथा न्यूनतम 10 लाख रुपये जुर्माने का प्रावधान है।
हेल्थ सप्लीमेंट के लेबल पर भी एफएसएसएआई की नजर…….
खाद्य सुरक्षा को लेकर भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) ने हेल्थ सप्लीमेंट और पोषक तत्वों से जुड़े उत्पादों की लेबलिंग को लेकर भी सख्ती बढ़ायी है। कंपनियों को निर्धारित नियमों और चेतावनी संबंधी निर्देशों का पालन करने की हिदायत दी गयी है। हेल्थ सप्लीमेंट, विशेष आहार उपयोग के लिए तैयार खाद्य पदार्थ और विशेष चिकित्सीय जरूरतों वाले उत्पादों के पैकेट पर उनकी प्रकृति, उपयोग और जरूरी चेतावनियों की स्पष्ट जानकारी देना अनिवार्य है। इसका उद्देश्य उपभोक्ताओं को सही जानकारी देना और भ्रामक दावों से बचाना है।
छापेमारी के बाद सबसे बड़ा सवाल—आगे क्या?……
जमशेदपुर में अंडों और मछलियों को अखाद्य रंगों से आकर्षक बनाने का मामला सामने आना महज खाद्य मिलावट का मुद्दा नहीं, बल्कि आम लोगों की जिंदगी और स्वास्थ्य से जुड़ा गंभीर सवाल है। छापेमारी के दौरान संदिग्ध सामग्री पकड़ना विभाग की कार्रवाई का एक हिस्सा है, लेकिन असली परीक्षा तब होगी जब प्रयोगशाला की अंतिम रिपोर्ट आयेगी और दोषियों पर ठोस कार्रवाई होगी।
आखिर शहर के होटलों और ढाबों में ग्राहकों को क्या परोसा जा रहा है? क्या खाद्य पदार्थों की नियमित जांच होती है? क्या मिलावटखोरों पर कार्रवाई केवल त्योहारों के आसपास ही तेज होती है? और सबसे अहम सवाल—आम आदमी अपनी थाली में रखे भोजन की शुद्धता पर भरोसा कैसे करे? अब देखना यह है कि खाद्य सुरक्षा विभाग की यह मुहिम छापेमारी और चेतावनी तक सीमित रहती है या मिलावट के इस खेल पर वास्तव में स्थायी लगाम लगती है। क्योंकि स्वाद और मुनाफे के नाम पर किसी को भी लोगों की सेहत से खिलवाड़ करने का अधिकार नहीं दिया जा सकता।



