चांडिल (सरायकेला-खरसावां) : चांडिल, चौका, कांड्रा रोड, पातकुम रोड एवं आसपास के क्षेत्रों में संचालित स्पंज आयरन उद्योगों से निकलने वाले जहरीले धुएँ, राख और सूक्ष्म धूलकणों के कारण क्षेत्र का पर्यावरण लगातार बिगड़ता जा रहा है। चारों ओर फैले प्रदूषण के कारण आम जनजीवन अस्त-व्यस्त हो गया है और लोगों के स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ रहा है।



विस्थापित अधिकार मंच फाउंडेशन के अध्यक्ष राकेश रंजन ने कहा कंपनी से निकलने वाली काली धूल दिन-रात हवा में फैलकर घरों, पेड़-पौधों, जल स्रोतों और खेतों पर जम रही है। इससे लोगों में सांस लेने में तकलीफ, खांसी, दमा, आंखों में जलन, त्वचा रोग और फेफड़ों से जुड़ी बीमारियों का खतरा तेजी से बढ़ रहा है। बच्चों, बुजुर्गों और पहले से बीमार लोगों के लिए यह स्थिति और अधिक खतरनाक बन गई है।
प्रदूषण नियंत्रण व्यवस्था पर उठे गंभीर सवाल…..
उन्होनें आगे कहा उद्योगों में आवश्यक प्रदूषण नियंत्रण उपकरण जैसे—ESP (Electrostatic Precipitator), बैग फिल्टर, साइक्लोन सेपरेटर, वेट स्क्रबर, डस्ट एक्सट्रैक्शन सिस्टम, वेस्ट हीट रिकवरी बॉयलर (WHRB), कंटीन्यूअस एमिशन मॉनिटरिंग सिस्टम (CEMS), ग्रीन बेल्ट तथा फ्यूजिटिव डस्ट कंट्रोल सिस्टम—या तो लगे नहीं हैं या प्रभावी ढंग से काम नहीं कर रहे हैं।
ऐसे में यह बड़ा सवाल खड़ा होता है कि क्या इन उद्योगों में पर्यावरण मानकों का पालन किया जा रहा है, और यदि नहीं, तो इसकी जिम्मेदारी किसकी है।
जांच और निगरानी की मांग तेज……
उन्होंने मांग की है कि उद्योगों की नियमित जांच कराई जाए और यह सुनिश्चित किया जाए कि प्रदूषण नियंत्रण उपकरण सही तरीके से कार्य कर रहे हैं या नहीं। इसके साथ ही ऑनलाइन मॉनिटरिंग सिस्टम (CEMS) के आंकड़ों की भी निष्पक्ष जांच की जानी चाहिए।
इस संदर्भ में Jharkhand State Pollution Control Board, जिला प्रशासन एवं संबंधित एजेंसियों की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं।
अनुमतियों की प्रक्रिया भी जांच के घेरे में……
इन उद्योगों को CTE (Consent to Establish), CTO (Consent to Operate), Environmental Clearance (EC) सहित अन्य कानूनी स्वीकृतियां किन आधारों पर दी गईं।
साथ ही Air (Prevention and Control of Pollution) Act, 1981, Water (Prevention and Control of Pollution) Act, 1974, Hazardous Waste नियम एवं Factory Act के प्रावधानों का पालन हुआ या नहीं, यह भी जांच का विषय बन गया है।
घनी आबादी के बीच उद्योग, बढ़ा खतरा……
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि ये उद्योग घनी आबादी, स्कूलों, अस्पतालों और चांडिल बांध विस्थापितों के पुनर्वास क्षेत्रों के निकट संचालित हो रहे हैं। विस्थापित लोग पहले ही अपने मूल स्थान से हटाए जा चुके हैं और अब प्रदूषण की मार झेलने को मजबूर हैं।
चारों ओर प्रदूषण का माहौल…..
स्थानीय लोगों के अनुसार कांड्रा रोड, पातकुम रोड और चांडिल चौका क्षेत्र में कई स्थानों पर स्पंज आयरन इकाइयों के आसपास धुएं और धूल का घना प्रभाव देखा जा रहा है।
जनप्रतिनिधियों की भूमिका पर भी उठे सवाल…….
क्षेत्र के लोगों में इस बात को लेकर भी नाराजगी है कि ईचागढ़ विधानसभा की माननीय विधायक सबिता महतो, जो झारखंड विधानसभा में प्रदूषण एवं नियंत्रण बोर्ड से संबंधित जिम्मेदारी भी संभाल रही हैं, उनके स्तर पर अपेक्षित ठोस कार्रवाई नजर नहीं आ रही है।
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि केवल कंबल वितरण जैसे कार्यों से क्षेत्र की मूल समस्या का समाधान नहीं हो सकता। क्या कंबल बांटने से मिट्टी की उर्वरता वापस आएगी? क्या इससे वायु और जल प्रदूषण खत्म होगा? क्या इससे लोगों, पशु-पक्षियों में फैल रही बीमारियां रुक जाएंगी?
प्रशासन से सख्त कार्रवाई की मांग…….
नागरिकों एवं सामाजिक संगठनों ने प्रशासन से मांग की है कि सभी उद्योगों की उच्चस्तरीय जांच कराई जाए, प्रदूषण नियंत्रण मानकों का सख्ती से पालन सुनिश्चित किया जाए और नियमों का उल्लंघन करने वाली कंपनियों पर कठोर कार्रवाई की जाए।
साथ ही प्रभावित क्षेत्रों में स्वास्थ्य जांच शिविर आयोजित करने और पीड़ित लोगों को उचित मुआवजा देने की भी मांग की गई है. यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो चांडिल- चौका क्षेत्र में पर्यावरणीय संकट और गहरा सकता है, जिससे आने वाले समय में जनस्वास्थ्य पर गंभीर खतरा उत्पन्न हो सकता है।



